ग्राम देवता से गोरखनाथ पंथ तक: कवर्धा अंचल में जीवित है सदियों पुरानी साधना परंपरा**

अलख जगाते जोगियों की परंपरा, ग्राम देवताओं की लोकमान्यता और मानूडोंगर के गुरु गोरक्षनाथ धाम की आध्यात्मिक विरासत**

कबीर क्रांति ब्रेकिंग न्यूज़ देखिये डी एन योगी की  विशेष रिपोर्ट

कवर्धा। भारत की लोक एवं आध्यात्मिक परंपराओं में नाथ संप्रदाय की साधना का विशेष स्थान माना जाता है। कभी गांव-गांव चिकारा, तंबूरा, इकतारा और सारंगी जैसे वाद्ययंत्रों के साथ घूमने वाले जोगी-योगी अपने भजनों के माध्यम से लोगों को आध्यात्मिकता के साथ सामाजिक जीवन की सीख भी दिया करते थे। बुजुर्गों की स्मृतियों में आज भी इन जोगियों के भोर में गांव की गलियों में “अलख निरंजन” का उद्घोष करते हुए भ्रमण करने की तस्वीरें जीवित हैं।

कवर्धा में नाथ परंपरा की जीवंत विरासत: मानूडोंगर में गूंजती है अलख निरंजन की साधना

ग्राम देवताओं की आस्था, जोगियों की लोक परंपरा और गुरु गोरक्षनाथ धाम की आध्यात्मिक पहचान

कवर्धा। छत्तीसगढ़ के कवर्धा अंचल में नाथ संप्रदाय की प्राचीन साधना परंपरा आज भी लोक आस्था के रूप में जीवित दिखाई देती है। कभी गांव-गांव चिकारा, तंबूरा, इकतारा और सारंगी जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ घूमने वाले जोगी-योगी अपने भजनों के माध्यम से लोगों को आध्यात्मिक संदेश देने के साथ सामाजिक जीवन की सीख भी दिया करते थे। बुजुर्गों की स्मृतियों में आज भी इन जोगियों के भोर में गांव की गलियों में “अलख निरंजन” का उद्घोष करते हुए भ्रमण करने की तस्वीरें जीवित हैं।

भजन में छिपा होता था जीवन का संदेश

लोक परंपरा के अनुसार नाथपंथी जोगियों के भजनों में लोभ-लालच, छल-कपट, ईर्ष्या-द्वेष, पारिवारिक कलह और अंधविश्वास जैसी सामाजिक बुराइयों पर कटाक्ष किया जाता था। वहीं जीव-दया, करुणा, प्रेम, संयम, धैर्य और ईश्वर भक्ति को जीवन का आधार बनाने का संदेश दिया जाता था।

कहा जाता है कि ये साधु किसी एक स्थान पर लंबे समय तक नहीं रुकते थे। गांव के बाहर वृक्षों के नीचे धूनी रमाकर कुछ समय निवास करने और फिर आगे बढ़ जाने की परंपरा के कारण इन्हें “रमता जोगी” भी कहा जाता था।

“रमता जोगी, बहता पानी—दोनों की अपनी बानी।

बहने से जो रुक जाता है, कीचड़ बन जाता पानी।”

मांगकर नहीं, स्वेच्छा से मिली भिक्षा की परंपरा

नाथ जोगियों की लोककथाओं में यह मान्यता भी मिलती है कि साधु स्वयं मांगकर भिक्षा नहीं लेते थे। किसी श्रद्धालु ने स्वेच्छा से कुछ दिया तो उसे स्वीकार किया जाता था। पुराने समय में एक दिन में सीमित घरों से थोड़ी मात्रा में अनाज ग्रहण करने की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है।

ठंड के दिनों में पुराने कपड़ों से कंथा या गोदड़ी बनाकर उपयोग करना, कमंडल रखना और धूनी की भस्म को प्रसाद के रूप में देना—इन साधुओं की सादगी और तपस्वी जीवन शैली से जुड़ी लोक स्मृतियां आज भी ग्रामीण अंचलों में सुनाई देती हैं।

ग्राम देवता और ‘बावा देवता’ की लोकमान्यता

भारत के अनेक गांवों में गांव की सीमा अथवा बाहर किसी पुराने वृक्ष, चबूतरे या निर्धारित स्थान को ग्राम देवता के रूप में मानने और पूजा करने की परंपरा रही है। कई क्षेत्रों में इन्हें स्थानीय बोली में “बाबा देवता” या “बावा देवता” भी कहा जाता है।

नाथ परंपरा से जुड़ी लोकमान्यताओं में ऐसे कई स्थानों को पुराने समय के तपस्वी जोगियों की साधना स्थली माना जाता है। ग्रामीण विश्वास के अनुसार इन साधना स्थलों से गांव की सुख-शांति और प्राकृतिक आपदाओं से रक्षा की कामना जुड़ी रही है।

हालांकि इन मान्यताओं का स्वरूप स्थान-स्थान पर अलग-अलग मिलता है और इनके इतिहास को समझने के लिए स्थानीय मौखिक परंपराओं के साथ पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक स्रोतों का अध्ययन भी महत्वपूर्ण है।

मानूडोंगर में गुरु गोरक्षनाथ की साधना परंपरा

कवर्धा अंचल में मानूडोंगर स्थित गुरु गोरक्षनाथ मंदिर/योगाश्रम नाथ परंपरा से जुड़े श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण आध्यात्मिक स्थल के रूप में सामने आता है। प्रस्तुत तस्वीरों में मंदिर, प्राकृतिक पहाड़ी क्षेत्र, नाथ साधुओं और गुरु गोरक्षनाथ की प्रतिमा के दर्शन होते हैं।

स्थानीय परंपरा और श्रद्धालुओं के अनुसार यह क्षेत्र साधना, तप और आध्यात्मिक गतिविधियों से जुड़ा रहा है। क्षेत्र के बुजुर्गों के बीच जोगी गुफा तथा चोड़चोड़ा पाट झरना-मानूडोंगर क्षेत्र से जुड़ी अनेक लोककथाएं भी प्रचलित हैं।

संगीत और साधना का अद्भुत संगम

नाथ जोगियों की पहचान केवल उनके भगवा वेश से नहीं थी, बल्कि उनके हाथों में दिखाई देने वाले पारंपरिक वाद्ययंत्र भी उनकी यात्रा का अभिन्न हिस्सा थे। प्रस्तुत फोटो में पारंपरिक तारयुक्त वाद्ययंत्र के साथ साधु की तस्वीर उस पुरानी लोक-संगीत परंपरा की याद दिलाती है, जिसमें भजन मनोरंजन का माध्यम मात्र नहीं बल्कि आध्यात्मिक और सामाजिक संदेश पहुंचाने का साधन भी हुआ करते थे।

12 वर्ष की साधना और कानफटा योगियों की परंपरा

नाथ परंपरा से जुड़ी कथाओं में दीर्घकालीन तपस्या, गुरु-शिष्य परंपरा तथा कठिन साधना का विशेष उल्लेख मिलता है। कर्णछेदन और कुंडल धारण करने की परंपरा नाथ योगियों की विशिष्ट पहचान रही है। हालांकि अलग-अलग नाथ परंपराओं और मठों में दीक्षा की विधियां तथा उनकी अवधि अलग हो सकती हैं, इसलिए इन्हें एक ही ऐतिहासिक नियम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

आज जरूरत है विरासत को संजोने की

आधुनिक समय में गांवों में भोर के समय अलख जगाते हुए घूमने वाले जोगियों की परंपरा काफी कम दिखाई देती है। ऐसे में बुजुर्गों की स्मृतियां, पुराने भजन, लोककथाएं, साधना स्थल और ग्राम देवताओं से जुड़ी मान्यताएं हमारी लोक-सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

कवर्धा अंचल में मौजूद जोगी गुफा, मानूडोंगर और गुरु गोरक्षनाथ मंदिर जैसे स्थलों से जुड़ी लोक स्मृतियों का दस्तावेजीकरण किया जाए तो आने वाली पीढ़ियों को इस क्षेत्र की आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक परंपरा को समझने में मदद मिल सकती है।

लेखक एवं संकलन – योगी हरिहर नाथ, गुरु योगी विलासनाथ जी महाराज

संस्थापक/महंत – गुरु गोरक्षनाथ मंदिर, मानूडोंगर, कवर्धा (छत्तीसगढ़) मो, 8120503326

कबीर क्रांति ब्रेकिंग न्यूज़

विशेष प्रस्तुति – संपादक डी.एन. योगी

“अपने इतिहास और लोक परंपराओं को जानें, समझें, संरक्षित करें और आने वाली पीढ़ी तक पहुंचाएं।”

आदेश। अलख निरंजन। 🚩

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