कवर्धा

कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता एक छलावा एक पाखंड—  श्रीपाल शर्मा

कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता एक छलावा एक पाखंड—

 श्रीपाल शर्मा

अपने शासन काल से लेकर आज तक कांग्रेस ने हमेशा छद्म-धर्मनिरपेक्षता का सहारा लिया है। उसकी कथित धर्म-निरपेक्षता हिंदुओं के लिए एक छल है, एक धोखा है। कांग्रेस ने छद्म-निरपेक्षता का सहारा लेकर एक तरफ तो अल्पसंख्यकों को लुभाती रही है, दूसरी तरफ उसे हथियार बनाकर हिन्दुओं पर हमला करती रही है। कांग्रेस जिस तरह की धर्मनिरपेक्षता लेकर शासन करती रही है वैसी धर्म-निरपेक्षता पूरे संसार में किसी भी देश में देखने को नहीं मिलती। अमेरिका आदि अनेक देश धर्म-निरपेक्ष (सेक्युलर स्टेट) हैं पर वहां भी इस प्रकार की धर्मनिरपेक्षता नहीं देखी गई जैसी धर्म-निरपेक्षता कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने अब तक अपनाई है। अमेरिका में राजकीय कार्य जैसे शिलान्यास, उद्घाटन आदि कार्य ईसाइयों के धर्मगुरु पादरी द्वारा ईश वंदना से शुरू किया जाता है। उसमें सभी दल के लोग समान रूप से भाग लेते हैं। किसी दल को कोई आपत्ति नहीं होती। अमेरिकियों का स्पष्ट कहना है धर्मनिरपेक्षता का मतलब धर्म हीनता नहीं है। यह बात आईने की तरह साफ़ है कि जिस देश में जिस धर्म के लोगों का बाहुल्य है अथवा बाहुल्य होता है वही धर्म राष्ट्र का धर्म कहलाता है। मुस्लिम देशों का धर्म इस्लाम है।

ईसाई देशों का धर्म ईसाइयत है इसी तरह यहूदी बौद्ध आदि देश हैं वहाँ उनका बाहुल्य है। हिन्दू धर्म मानने वाले एक मात्र ऐसे हैं जो 120 करोड़ से ऊपर होने के कारण भी उनका कोई देश नहीं है भारत में सबसे अधिक हिन्दू हैं पर उन्हें हिन्दू राष्ट्र कहने से अभी तक रोका गया है। स्पष्ट शब्दों में कहा जाये तो धर्मनिरपेक्षता का मतलब बस इतना ही है कि सत्ता में बैठे बहुसंख्यक धर्म के लोग अपने देश के सभी लोगों के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करेंगे चाहे वे किसी भी धर्म का हों। क्या हमारे देश में काँग्रेसी शासन काल में ऐसा होता आया है मैं एक-दो उदाहरण देकर अपनी बात को स्पष्ट करता हूँ।जब भारत में कांग्रेस का शासन था तब प्रथम राष्ट्रपति डा. स्व. राजेन्द्र प्रसाद को सोमनाथ मंदिर के पुनरुद्धार के लिए आमंत्रण मिला था बाबू स्व. राजेन्द्र प्रसाद जी ने आमंत्रण स्वीकार कर सहर्ष जाने को तैयार हो गए जैसे ही जवाहर लाल नेहरू जी उस समय भारत के प्रधानमंत्री थे उन्हें पता चला कि सोमनाथ मंदिर के पुनरुद्धार के लिए राष्ट्रपति जा रहे हैं तो उन्होंने उन्हें जाने को स्पष्ट मना कर दिया।

“…और कहा कि आपका इस तरह सोमनाथ मंदिर के पुनरुद्धार में जाना संविधान का उल्लंघन होगा। यह हमारी धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ है। डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी ने साफ इनकार कर दिया और कहा कि मैं जाऊंगा चाहे मुझे इसके लिए अपना पद ही क्यों न छोड़ना पड़े। राष्ट्रपति जी मंदिर के कार्यक्रम में गये पं. नेहरू ने बाद में चुप्पी साध ली।दूसरा उदाहरण है छत्तीसगढ़ का। एक बार जब केंद्र में भाजपा की सरकार थी और प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी जी थे, तब केंद्र सरकार ने शिक्षा मंत्रियों का सम्मेलन बुलाया था। छत्तीसगढ़ को भी आमंत्रण मिला था उस समय छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार थी। सम्मेलन का प्रारंभ मां सरस्वती देवी की वंदना से किया गया। यदि मैं भूल नहीं रहा हूँ तो छत्तीसगढ़ के एक शिक्षा मंत्री ने यह कह कर मां सरस्वती की वंदना का बहिष्कार किया कि यह सांप्रदायिकता है। धर्मनिरपेक्षता का उल्लंघन है, संविधान के खिलाफ है। इस तरह की विकृत मानसिकता वाली कांग्रेस हमारे देश में लंबे समय तक राज्य करती रही। कांग्रेसियों का पाखंड हरि अनंत हरि कथा अनंता की तरह है।”

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