भारत हिंदुराष्ट्र अवश्य बनेगा -स्वामी निश्चलानंद सरस्वती
साधना एवं राष्ट्र रक्षा शिविर में सम्मिलित हुए अवधेश नंदन

भारत हिंदुराष्ट्र अवश्य बनेगा -स्वामी निश्चलानंद सरस्वती
साधना एवं राष्ट्र रक्षा शिविर में सम्मिलित हुए अवधेश नंदन
कवर्धा। डी एन योगी कबीर क्रांति
कवर्धा,,श्री विमलाम्बाशक्ति संस्थानम हरदोखानपुर (पंजाब) में आयोजित तीन दिवसीय 24वॉ साधना एवं राष्ट्ररक्षा शिविर में आदित्यवाहिनी के प्रदेश उपाध्यक्ष अवधेश नन्दन श्रीवास्तव ने सपरिवार सम्मिलित होकर छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व किया। साथ ही श्रीमज्जगदगुरू शंकराचार्य स्वामी श्रीनिश्चलानंद सरस्वती जी महाभाग के आदेश पर देश भर से आए प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए आदित्यवाहिनी छत्तीसगढ़ के प्रकल्पों से अवगत कराया तथा तीसरे दिन पुनः राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक को संबोधित करते हुए कार्ययोजना की विस्तृत जानकारी दी।
इस अवसर पर ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय श्रीगोवर्धन मठ पुरी पीठाधीश्वर श्रीमज्जगदगुरू शंकराचार्य स्वामी श्रीनिश्चलानंद सरस्वती जी महाभाग ने कहा कि उसी व्यक्ति का जन्म लेना सार्थक है जिसने पुनः जन्म न लेने के लिए जन्म लिया हो और उसी की मृत्यु सार्थक है जिसकी पुनः मृत्यु न हो अर्थात जो जन्म और मृत्यु की अनादि अजस्र परम्परा का आत्यंतिक उच्छेद करने में समर्थ हो।
हिंदू राष्ट्र अभियान के बारे में उन्होंने कहा कि भारत हिंदू राष्ट्र अवश्य बनेगा। आगे चलकर पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि भी भारत में मिलेंगे और अखण्ड भारत का निर्माण होगा। हिंदू राष्ट्र निर्माण पर राजनेताओं की भूमिका के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि केवल समर्थ होने से काम नहीं बनता। समर्थता भी चाहिए और निमित्तता भी चाहिए। जो इस कार्य के निमित्त होंगे वे सभी साथ देंगे।
शुक्र नीति में 32 विद्या और 64 कलाओं का वर्णन है। वाणी की प्रधानता से जिस कार्य का संपादन हो उसे विद्या कहते हैं तथा मूक रहकर भी जिस कार्य का संपादन हो जाए उसे कला कहते हैं।
उन्होंने आगे कहा कि समष्टि के साथ अपने मन को जोड़ेंगे तो सबके हित में अपने जीवन का उपयोग होगा। इसके लिए उन्होंने चार सूत्र बताया- हितैषी, हितज्ञ, हित करने में तत्पर और समर्थ हों। काम करने की विधा हो तो असंभव भी संभव हो जाता है।
एक प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा कि व्यक्ति के स्वभाव में तीन कमियां ना हों। अपने से ऊपर वालों के प्रति ईर्ष्या न हो, बल्कि प्रेम हो, बराबर वालों के साथ स्पृहा अथवा स्पर्धा न हो बल्कि मैत्री का भाव हो तथा नीचे वालों के प्रति हीनता का भाव न होकर अपनत्व का भाव हो। हर कार्य आदेश पर नहीं बल्कि दृष्टिकोण को समझकर करना चाहिए। 80 प्रतिशत कार्य भावराज्य में बना लीजिए तथा शेष 20 प्रतिशत कार्य के लिए मैदान में उतारिए, सफलता अवश्य मिलेगी।
रोज घर में सभी सदस्य कम से कम एक बार अवश्य बैठें, आपस में संगोष्ठी कर पांच सात मिनट सत्संग भजन करें एक दूसरे का कुशल क्षेम पूछें, कोई भ्रम हो तो उसे दूर करें और यदि कोई भूल हुई हो तो उसे विनम्रतापूर्वक स्वीकार करें।
संगोष्ठी के दौरान श्रोताओं के प्रश्नों का उत्तर देते हुए जगद्गुरू शंकराचार्य ने कहा कि अकाल मृत्यु वह है जिस में व्यक्ति दक्षिणायन मार्ग अथवा उत्तरायण मार्ग से च्युत हो जाए। अर्थात अधोगति को प्राप्त हो जाए। अकाल मृत्यु की दशा में विष्णु सहस्रनाम, श्रीरामरक्षा स्त्रोत, गरुड़ पुराण आदि का पाठ करना चाहिए जिससे अकाल मृत्यु प्राप्त जीव की सद्गति होती है।




