किस दिशा में जा रही है भारतीय राजनीति???मुकुंद माधव कश्यप की कलम से, संपादकीय
कवर्धा,,डी एन योगी

कवर्धा,,,महाराष्ट्र की राजनीतिक घटनाक्रम में एक बार फिर भारतीय राजनीति को झकझोर कर रख दिया है।ढाई साल पुरानी शिव सेना, एनसीपी,कांग्रेस व अन्य की गठबंधन सरकार के सामने शिव सेना के ही एक मंत्री के विद्रोह ने शिव सेना को वजूद के समस्या से दो चार कर दिया है।
बात चली पार्टी से अलग होकर अलग दल बनाने और नया गठबंधन तैयार करने की तो भारतीय राजनीति में यह दलबदल नया बिलकुल भी नहीं है।
स्वतंत्र भारत में राजनीतिक रिपोर्ट और आंकड़े देखें तो बेहत चौंकाने वाले है।
1967 और फरवरी 1969 विधानसभा के चुनावों के बीच राज्यों और संघ शासित प्रदेशों के करीब 3500 सदस्यों में 550 सदस्यों ने अपना दल बदला था।
इतिहास बताता है कि 1948 में जब कांग्रेस समाजवादी दल ने कांग्रेस संगठन छोड़ने का फैसला लिया तो सभी विधायकों से कहा गया कि वे इस्तीफा देकर फिर से चुनाव लड़ें।एक आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया गया।बाद में यह आदर्श आदर्श ही रह गया।
1952 के विधानसभा चुनाव में मद्रास विधान सभा अब चेन्नई में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला यहां भी रोचक स्थिति उत्पन्न हुई।
*राजनीति में आया राम गया राम*
इनकी भी दिलचस्प राजनीतिक कहानी है।
हरियाणा में 1967 के विधानसभा चुनाव में निर्दलीय विधायक थे श्री गया लाल।इन्होंने 15 दिनों में 3 बार दल बदला।निर्दली चुनाव जीते चुनाव जीत कर कांग्रेस में गए।फिर कांग्रेस छोड़कर वे “विशाल हरियाणा पार्टी” में शामिल हो गए। श्री गया लाल जी कुछ दिनों के पश्चात पुनः कांग्रेस में आ गए।लेकिन इसके नौ घण्टे बाद दूसरी बार विशाल हरियाणा पार्टी पहुंच गए।विकास हरियाणा पार्टी के नेता राव बीरेंद्र सिंह ने श्री गया लाल को लेकर राजधानी चंडीगढ़ में प्रेस वार्ता की और कहा “गया राम” अब “आया राम है”। तब से राजनीति में आया राम गया राम कहावत चल पड़ी।
*दल बदल कानून 1985*
चुनाव के बाद बढ़ती हुई दल बदल की समस्या से सभी राजनीतिक दल परेशान थे।1985 में तत्कालीन राजीव गांधी की सरकार ने संविधान में 52 वे संशोधन करते हुए दल बदल पर नकेल कसने का प्रयास किया।इसके अनुसार यदि कोई निर्वाचित सदस्य अपनी पार्टी से इस्तीफा देता है तो उसे सदन के सदस्यता के लिए अयोग्य माना जायेगा।एक पार्टी के चुनाव चिह्न पर जीतने के पश्चात यदि अन्य दल की सदस्यता लेता है तो उसे सदन की सदस्यता से हाथ धोना पड़ेगा।
इसी कानून के अनुसार पार्टी के निर्वाचित कुल सदस्य में से दो तिहाई निकल कर नई पार्टी बना सकता है।
*विंस्टल चर्चिल हमेशा जानें जायेंगे*
राजनीतिक शुचिता के लिए पूरे विश्व में इंग्लैंड के प्रधानमंत्री श्री चर्चिल हमेशा जानें जायेंगे।उन्होंने अपने संसदीय जीवन की शुरुआत सन 1900 में सांसद बनकर की।वे कंजरवेटिव पार्टी के टिकट पर चुनाव जीते लेकिन चार साल में उनका कंजरवेटिव पार्टी से मोहभंग हो गया।उन्होंने इस बात की चर्चा संसद में करते हुए घोषणा की वे अपने दल बदल के संबंध में अपने संसदीय क्षेत्र के मतदाताओं से रायशुमारी करना चाहेंगे और यदि मतदाता उनसे कहेंगे की पद छोड़ दो और दोबारा चुनाव लड़ो तो इस बात के लिए तैयार है। ऐसा प्रसंग बहुत मुश्किल से मिलता है।
सन 1982 का हरियाणा विधानसभा का प्रसंग और भी बहुत रोचक है। ऐसा सामूहिक दल बदल हुआ कि प्रदेश की सरकार का मुख्यमंत्री तो वही रहा दल बदल से पूरे सदस्य दूसरी पार्टी में चले गए मुख्यमंत्री सहित।
*अपने उत्तरदायित्व से कोई बच नहीं सकता*
आजाद भारत में लोकतांत्रिक प्रक्रिया शुरू हुई उस समय जिस दल ने केंद्र में लंबी राजनीति की तो राजनीतिक घटनाएं भी घटेगी। दल बदल की घटनाएं राजनीतिक उठापटक स्वाभाविक है।आज हो रही राजनीतिक घटनाओं के लिए यदि हम दूसरों पर दोषारोपण करते है तो हम अपने उत्तरदायित्व से मुंह फेर रहे हैं।दल बदल रोकने सरकार गिराने कानून की नही ठोस उपाय की जरूरत है।मूलभूत सुधार ही इसका हल हो सकता है।अवसरवादी राजनीति कब खत्म होगी यह तो समय के गर्भ में है।कब तक लोग कथित अंतरात्मा की आवाज के सहारे लोगों को छलते रहेंगे।विधायकों और सांसदों की स्थिति आईपीएल के खिलाड़ी जैसी बोली लग रही है।यह दुर्भाग्यजनक और चिंतनीय है।
*शांति का टापू छत्तीसगढ़ सुरक्षित है*
महाराष्ट्र में उपजी राजनीतिक समस्या को यदि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।विधायकों जनप्रतिनिधियों की अपेक्षा की बात भी उभरी है।कार्यकर्ताओं में असंतोष दिख रहा है।
देश में राजनीतिक हालातों के बीच छत्तीसगढ़ का राजनीतिक माहौल बेहत शांत है।यहां की सरकार तीन चौंथाई से भी अधिक सीटों के साथ किसी भी तरह के संकट से महफूज है। छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री की राजनीतिक शैली के चलते यहां मंत्री और विधायकों में काफी सामंजस्य है।

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