कवर्धा,, डी एन योगी, कबीर क्रांति

कवर्धा,,छत्तीसगढ़ के घने वनों में निवास करने वाले बैगा समुदाय भ्ररममार और तेलियाकंद नामक दुर्लभ औषधि का उपयोग रक्त कैंसर की चिकित्सा में करते हैं।टुटी हड्डी पर हड़जुडी की पत्तियों का लेप बनाकर उस स्थान पर बांधने और खाने से हड्डी कुछ दिनों में ठीक हो जाती हैं………. ‍‌ आदिवासी समाज के सभी समुदायों की ज्ञान की परम्परा बहुत समृद्ध रहीं हैं छत्तीसगढ़ के घने जंगलों में बैगा जनजाति शरीर पर कहीं चोट लग जाने पर ये लोग कुरकुट के पत्ते की लेप लगाते हैं जिससे घाव भर जाता हैं और टांके लगाने की जरूरत नहीं होती हैं मलेरिया बुखार आने पर पीपल की दातून करते हैं। उसकी पहली पीक थूक दे और शेष को गटक ले। कैसा भी मलेरिया बुखार दो दिन में ठीक हो जाएगा । दांत दर्द के लिए चितावर की डेढ़ पत्ती को दांतों में दबाने से दांत के कीड़े मर जाते हैं।इक या अकवन के दुध की दो -तीन बूंद दांत में लगाने से दर्द ठीक हो जाता हैं। सिर या दाढ़ी के बाल अचानक झड़ने शराब बनाने वाले मटके की कालिख को एकत्र कर उस स्थान पर लगाने से दुसरे दिन ही बाल आने लगते हैं। मूत्र विकार में जरिया पौधे की ढाई पत्ती को चबाकर उसके रस को निगलने और उसकी पति्यो को चबाकर उसे गुद्दी में लगाने से पेशाब की जलन ठीक होता है
जुलाब लाने के लिए वन अंडी की जड़ को अंगुली से नाप कर अधिकतम दो या तीन अंगुल चुसने से धोया चार बार जुलाब हो जाता है।आईफ्लू हो जाने पर या आंखों पर लालिमा बने रहने पर नमक की डली को आंख में लगाकर उस नमक की डली को पानी के मटके के नीचे रख देते है, जैसे ही नमक घुलना शुरू होता हैं, आंखों को राहत मिलना शुरू हो जाता है। इसका दूसरा निदान हैं, जिसमें जरिया की पत्तियों को चबाकर आंखों में फुंकने से आंखों का दर्द ठीक हो जाते हैं
बच्चों में सुखा रोग हो जाने पर असमिया सर्प की केंचुली या रीढ़ की हड्डी की माला बनाकर बच्चे के गले में पहना देते हैं।छोटे बच्चों को दस्त लग जाने पर मुर्गी के अण्डे को फोड़ कर उसे जमीन पर एक पट्टे रखकर उसके ऊपर बच्चे को बैठा देते हैं , जिससे बच्चे चंकी गुदा संकुचन होता है और उस अंडे का द्रव गुदा द्वार से बच्चे के पेट में पहुंच जाता है और बच्चे का दस्त बंद हो जाता है।
सर्प दंश पर इद्रावन की जड़ को खिलाने, करौंदे की जड़ को पानी में उबालकर पिलाने और राहर की जड़ों को चबाने से ज़हर उतर जाता हैं या जिस स्थान पर सर्प ने काटा है उस स्थान पर मुर्गे की चूजी की गुदी लगाई जाती हैं। चूजा मर जाता हैं यह प्रकिया ज़हर उतरने तक किया जाता हैं और तब तक चूजों का मरना बंद हों जाता है।
पागल कुत्ते या सियार के काटने पर राहर की डाली के पौधे में पाईं जाने वाला एक प्रकार की कीड़ा, मक्का का पुष्पाग और इद्रावन की जड़ को पीसकर गुड़ या महुआ की शराब के साथ पिलाते हैं, जिसके कारण पेशाब से खून के कतरे गिरते हैं। इसी प्रकार से उपचार बैगा जनजाति बैगा चक क्षेत्र में किया जाता हैं।
सफेद आक की,जड़ और अजवायन को कुटकर उसके पाउडर को गुड़ के साथ खिलाने से दमा और एलर्जिक अस्थमा का शर्तिया इलाज किया जाता हैं। जिन्हें कथाकथित विकसित लोग पिछड़े और जंगली कहते हैं उनके आदिम और जंगली ज्ञान को निकट जाकर देखने से ही असलियत का पता चलता हैं। मैंने औषधि ज्ञान के बारे में करीब से देखा और अध्ययन किया और पाया कि बैगा आदिवासियों के बच्चा पैदा होने के बाद बैगिन अपने कपड़े स्वय धोकर व नहाकर आ जाती है गर्भवती रहते हुए उन्हें छेवारी दवा खिलाया जाता हैं।जो आधुनिक मेडिकल साइंस को नकारते हैं। प्रकृति ने आदिवासी समुदाय को अपार स्नेह दिया है, जिसमें दुर्लभ जड़ी-बूटियों हैं। आदिवासी क्षेत्रों के सघन वनों में औषधि पौधों की मात्रा बहुतायत हैं, जिनसे आदिकाल से आदिवासी समुदाय स्वास्थय लाभ लेते आ रहें हैं। आदिवासी परम्परानुसार माटी -पुजारी या देव पुजारी के समक्ष जड़ी-बूटियों को खिलाई या पिलाई जाती है। जड़ी-बूटियों के उपयोग करने से पहले उसे एक दिन पूर्व विधि-विधान से पूजन कर उपयोग में लाया जाता हैं।
बैगा जनजाति के औषधि ज्ञान के बारे में छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले के बोड़ला विकास खण्ड के मोतीबैगा बहनाखोदरा चिल्पी महासिग,लमतूबगदरिया,ढिमराझुमड़िया,भुरसीपकरी हरेसिह बैगा बाघमाड़ा एवं अमनिया पंडरिया के इतवारी बैगा को विशेष ज्ञान है जो आज भी अपनी प्राचीन पद्धति से इलाज करते हैं।
बैगा जनजाति छत्तीसगढ़ व मध्यप्रदेश की प्रमुख आदिवासी समुदाय हैं , सतपुड़ा पर्वत तथा मैकल श्रेणी के पूर्वी भाग शहडोल,डिड्डोरी, मंडला, बालाघाट, बिलासपुर , राजनांदगांव एवं कबीरधाम जिले में निवास करते हैं इनकी जनसंख्या चार लाख के करीब है, छत्तीसगढ़ में बैगा जनजाति को विशेष पिछड़ी जनजातियों का दर्जा दिया गया है।
‌छत्तीसगढ के बैगाओ की मान्यता है कि कभी दुसरो के यहां मजदुरी नहीं करना, काम करना केवल अपने लिए,ये खुद को वनपुत्र कहते हैं।आखेट व वनोपज पर निर्भर रहते आते हैं। कालांतर में ये खेती करने लगे जिससे बाद में बड़े पारंगत होते गए, इसके पीछे मान्यता है कि ,धरती हमारी मां हैं, मां की छाती के एक ही स्थल को दुह या जोताई कर बार-बार पेट नहीं भरना चाहिए ऐसा करने से मां कमजोर होती हैं ,वे अपनी माता को किसी प्रकार की कष्ट नहीं पहुंचाना चाहते। इसी कारण बेवर खेती को बैगा जनजाति अपनाते हैं। जिसमें जंगल को साफ कर खेती करते हैं।
बैगा जन अपनी विशिष्ट संस्कृति के लिए मशहूर हैं। बाहरी लोगों से मिलना जुलना कत ई पसंद नहीं करते यहां तक दीगर समुदाय के लोगों से भी, इनके यहां जिस घर में मौत हो जाती है,उस घर को ही छोड़ देते हैं। गोदना कला के माध्यम से विषेश कर स्त्रियो में तन सौन्दर्य उभारना इन्हें बहुत भाता है।
सन् 1960के बाद बाघ संरक्षण अभयारण्यों के नाम पर सर्वाधिक विस्थापन बैगा जनजातियों का हुआ हैं। जिसके कारण बैगा जनजाति में विखराव हुआ और अन्य जगह की जंगल को काट कर बस गए। बेवर खेती को बढ़ावा मिला, बैगा आदिवासी समुदाय के द्वारा मक्का कोदो वह कुटकी का फसल लिया जाने लगा जो सुगर फ्री अनाज हैं।बैगाओ की मुख्य विशेषता है कि महिलाएं गोदना कला की शौकीन है लेकिन ललाट पर बिंदी नहीं लगाती,वे नासिका छिद्र नहीं करवाती पुरूष लंबे केश रखते हैं। स्त्री व पुरूष घुटनों तक के ऊपर कप़ड़े पहनते हैं।स्त्रिया सिर नहीं ढंकती। दशहरा कर्मा ददरिया फाग और बिलमा के अवसरों पर स्त्री पुरुष दोनो नृत्य गान के बड़े शौकीन होते हैं।
होली के अवसर पर महीने भर चलने वाले मड़ई पर्व के प्रति ख़ासकर छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले के बैगाओ का उत्साह देखते ही बनता हैं। मड़ई पर्व के अवसर पर बैगा जनजाति देव मिलना और मड़ई अपने घर से लाते हैं।
प्रख्यात नृतत्व विज्ञानी वेरियर एल्विन ने बैगाओ पर शोधकार्य किया है। मध्यप्रदेश के पूर्वी जिले डिडौरी के घने जंगलों में बसे एक बैगा गांव रैतवार में वेरियर एल्विन सन् 1940मे में आए, वहीं बस गए। वहां बारह साल रहकर छब्बीस पुस्तक लिखी।एक चौदह वर्षीय कोशीबाई नामक बैगा किशोरी से वेरियर एल्विन ने शादी की तब एल्विन की उम्र चालीस वर्ष की थी,वेरियर एल्विन जवाहरलाल नेहरू के प्रिय मित्र थे।अपनी पत्नी को वेरियर एल्विन ने अपने संग भारत भ्रमण करवाया, नेहरू जी से भी मिलवाया।
कोशीबाई ने दो पुत्रों को जन्म दिया। लेकिन वक्त बदला, शादी के नौ साल बाद ही वेरियर एल्विन ने उसे तलाक दे दिया। इसके बाद उस महिला ने बेहद गरीबी और अभावों की जिंदगी काटी।कोशीबाई ने अंग्रेज़ पति के महज़ तेईस साल की उम्र में कोर्ट द्वारा एकतरफा तलाक के बाद पूरी जिंदगी उस रिश्ते को मन से माना और दुबारा शादी नही की।जब कोशीबाई की मृत्यु हुई तो लाश को कंधा देने उसके ही बैगा आदिवासी समुदाय के लोग नही आए। बताया जाता है कि वेरियर एल्विन ने दो अन्य आदिवासी लड़कियों से भी शादी की और उन्हें त्याग दिया।
अब भी बैगाओ का ध्यान खेती ‌-बाड़ी की तरफ नहीं है। अब ये लोग वनोंपज पर निर्भर रहते हैं। छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले के बोड़ला विकास खण्ड के दलदली क्षेत्र में निवास करने वाले बैगा समुदाय का बालको खदान के कारण संस्कृतिकरण हुआ है। छत्तीसगढ़ में वन अधिकार अधिनियम 2006के तहत पट्टे वितरण बैगा जनजातियों को किया गया है जिससे वह कृषि कार्य करने लगे,साथ ही इनकी जीविका का साधन इस प्रकार है।
(1) दहिया (बेवर) काटना और खेती करना लेकिन वन अधिनियम के कारण कम हो गया है।
(२) ‌ गांव में ओझा कार्य करना,झाड़ _फुक करना, जड़ी-बूटियों को एकत्र करना और उपचार करना।

(3) जंगल से कंदमूल,हर्रा बहेरा फल एकठ्ठा करना तथा बेचना एवं मछली पकड़ना,शिकार करना।

(4)बांस की टोकरी व चटाई बनाना।

संकलन कर्ता—-
प्रहलाद पात्रे मो.न 9893294373

 

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