कवर्धा

कबीर क्रांति ब्रेकिंग न्यूज़ देखिये डी एन योगी की रिपोर्ट* “जल संकट के बीच नलकूप माफिया बेलगाम: नियमों की अनदेखी, प्रशासन बेबस, किसान परेशान” रात्रि में धड़ल्ले से हो रहा अवैध खनन, शासन के प्रतिबंध को ठेंगा—कानून व्यवस्था पर उठते सवाल

कबीर क्रांति ब्रेकिंग न्यूज़

देखिये डी एन योगी की रिपोर्ट*

“जल संकट के बीच नलकूप माफिया बेलगाम: नियमों की अनदेखी, प्रशासन बेबस, किसान परेशान”

रात्रि में धड़ल्ले से हो रहा अवैध खनन, शासन के प्रतिबंध को ठेंगा—कानून व्यवस्था पर उठते सवाल

कवर्धा***जल संकट से जूझ रहे छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले में अवैध नलकूप खनन माफियाओं का बोलबाला जारी है। जिले में भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है, जिसे देखते हुए प्रशासन ने हाल ही में नलकूप खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। लेकिन प्रतिबंध केवल कागजों तक सीमित दिख रहा है—जमीनी हकीकत यह है कि रात के अंधेरे में धड़ल्ले से अवैध खनन जारी है।

प्रशासनिक नियमों के अनुसार, नलकूप खनन के लिए पूर्व सक्षम अधिकारी से अनुमति स्वीकृति आवश्यक है। बावजूद इसके, जिले में दर्जनों बोरिंग मशीनें बिना किसी वैधानिक अनुमति के कार्य कर रही हैं। ये मशीनें ज्यादातर पड़ोसी राज्यों से लाई गई हैं और इनके पीछे संगठित माफिया नेटवर्क सक्रिय है। किसानों से ‘अनुमति शुल्क’ के नाम पर हजारों-लाखों रुपये की वसूली की जा रही है।

माफिया और सत्ता का गठजोड़

स्थानीय सूत्रों के अनुसार, इन खनन माफियाओं की पकड़ सत्ता और प्रशासनिक व्यवस्था तक फैली हुई है। नतीजतन, सक्षम अधिकारी कार्यवाही करने में असहाय और मौन नजर आते हैं। यह स्थिति सीधे-सीधे कानून व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।

किसान दो पाटों के बीच

एक तरफ जल संकट से उपज का खतरा, दूसरी ओर खनन प्रतिबंध—किसान इन दो पाटों के बीच पिसता नजर आ रहा है। वैकल्पिक सिंचाई साधनों के अभाव में नलकूप ही उसकी एकमात्र उम्मीद है, लेकिन वैध प्रक्रिया ठप होने और अवैध खनन की महंगाई के कारण किसान बेहाल है।

नियम और कानून क्या कहते हैं

छत्तीसगढ़ भूजल (विकास और प्रबंधन) अधिनियम के तहत बिना अनुमति नलकूप खनन दंडनीय अपराध है। सक्षम अधिकारी से पूर्व अनुमति, स्थल निरीक्षण और तकनीकी स्वीकृति के बाद ही खनन की इजाजत दी जाती है। लेकिन मौजूदा हालात इस अधिनियम की अवहेलना का प्रतीक बन गए हैं।

रात्रिकालीन गश्त दल की जरूरत

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए अब आवश्यकता है कि जिला प्रशासन रात्रिकालीन विशेष निगरानी दल गठित करे, जो अवैध नलकूप खनन गतिविधियों पर सीधे कार्यवाही करे। रात्रि गश्त और ऑन-स्पॉट सीज़िंग की व्यवस्था ही माफियाओं के हौसले पस्त कर सकती है।

वर्षा जल संचयन को ग्राम पंचायत स्तर पर अनिवार्य किया जाए।
सूक्ष्म सिंचाई योजनाओं (ड्रिप, स्प्रिंकलर) को अधिकतम अनुदान और प्रशिक्षण से जोड़ा जाए , परंपरागत जल स्रोतों का पुनरुद्धार प्राथमिकता से किया जाए। नलकूप अनुमति प्रक्रिया को पारदर्शी, सरल और ऑनलाइन किया जाए।

जल संकट अब केवल पर्यावरणीय चुनौती नहीं रहा, यह सामाजिक और प्रशासनिक परीक्षा बन चुका है। जब माफिया कानून से ऊपर दिखे और किसान कानून के नीचे दबा हो, तब जिम्मेदारी केवल प्रशासन की नहीं, बल्कि शासन, नीति-निर्माता और समाज की भी बनती है। यदि अभी सख्ती नहीं बरती गई तो आने वाले वर्षों में जल संकट विकराल आपदा का रूप ले सकता है।

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