कवर्धा डी एन योगी ——————————- , कवर्धा बैगा गांव और बैगा स्त्री-पुरूष, शहरों, सरकारी अधिकारियों, वैज्ञानिक उपकरणों तथा सभ्य समाज के निरंतर संपर्क में आ रहा है। सरकारी योजनाएं उन तक पहुंच रही है। गांवों एवं समीपस्थ गांवों में बच्चों की शिक्षा का प्रबंध किया गया है।बैगाओ को खेती करने के लिए कुछ जमीन और जोतने के साधन उपलब्ध कराये गये है। बैगा चक के गांवों में सौर ऊर्जा से बिजली पहुंचाई जा रही है। पीने की पानी के लिए हैंडपंप और सोलर पम्प की व्यवस्था किया गया है। बैगा चक के लिए बैगा विकास अभिकरण ने विकास की योजना बनाई है। आदिवासियों के शोषण की समस्या हमेशा एक सी रही है। व्यसनों और रूढ़ियों में फंसे अशिक्षित और भोले आदिवासी अपने शोषण के खिलाफ अभी खड़े नहीं हो पाते।उल्टे उनके चंगुल में फंसते चले जाते हैं। बिचौलिए उनका सुख कबका लील गये है। बैगा समाज भी इससे अछूता नहीं है।बैगाओ में परिवर्तन की सम्भावना देखी जा सकती है।बस उन्हें दिशा की तलाश है। सरकारी योजनाएं का पूरा लाभ बैगाओ को लेना चाहिए।बैगाओ का रहन-सहन बदल रहा है। नई पीढ़ी के लड़के-लड़किया अपनी परम्परा गत पोसाग को त्यागकर पेट शर्ट, पाजामा,कमीज फ्राक आदि पहनना पसंद करते है। महिलाएं परम्परागत धोतियो को छोड़कर साड़ियां पहनने लगी है। प्लास्टिक की बनी चीजों का प्रयोग होने लगा है। बाजार में उपलब्ध क्लीप कंघे, चूड़ियां,नकली, गहने कर्ण फूल आदि खरीद कर पहनने लगे हैं। आज के आधुनिक युग में बैगा जनजाति की संस्कृति को बचाने हेतु बैगा प्रमुख के द्वारा लगातार सामाजिक लोगों से मिलकर बैगा संस्कृति को बचाने का प्रयास कर रहे हैं। फिर भी अन्य समाजों के सम्पर्क में आने से बैगा जनजाति बदलाव की ओर है। साप्ताहिक हाटों में दैनिक जीवन की वस्तुओं जैसे मिट्टी का तेल, कपड़े, अनाज, सब्जियां,गुड़,नमक के अलावा प्लास्टिक के कंघे, कांच की चूड़ियां बिकती हैं।चार, सिंघाड़े,टेमरू आदि मौसमी फल बिकते हैं।सादी और भुनी हुई मछलियां,चना परमल,लाई, मीठी सेब बाजार में ख़ूब बिकते हैं।चाय और पान की दुकानों पर बैगा पुरुष चाय पीते और पान खाते हैं।चोगी का स्थान अब बनी बनाई बीड़ी ने ले लिया है। लेकिन बैगा गांव में चोंगी का चलन है। बैगा समाज में शिक्षा का प्रतिशत बहुत ही कम है पुरानी पीढ़ी में यो शायद ही कोई पढ़ना लिखना जानता हो। लेकिन नई पीढ़ी का शिक्षा की ओर ध्यान आकर्षित हुआ है। बैगा गांवों में शिक्षा बढ़ाने के लिए बालवाड़ी स्कूल खोले गए हैं।बैगाओ के बच्चे स्कूल जाने लगे हैं। अधिकांश शिक्षा प्रायमरी तक ही सीमित है। हाईस्कूल ग्रेजुएशन की संख्या नगण्य है।यह अवश्य है कि न नई पौध में शिक्षा के प्रति चेतना अवश्य आई है।स्त्री शिक्षा के मामले में बैगा अभी भी काफी पीछे हैं। बैगा ग्राम में एक दो घरों में टीवी रेडियो अवश्य ही देखने को मिलता है समाचार के अलावा छत्तीसगढ़ी गीत व फिल्मी गीतों को बैगा युवक-युवतियां बड़े चाव से सुनते है। देश की राजनीतिक घटनाओं की थोड़ी बहुत जानकारी जागरुक बैगा अवश्य रखता है बैगा लोग अपने बच्चों को पढ़ाना लिखाना चाहते हैं, लेकिन आर्थिक पिछड़ापन उन्हें ऐसा करने से रोकता है। वनों में रहने वाले अधिकांश बैगा निरक्षर हैं। आज़ आधुनिक युग में बैगा जनजाति मे शिक्षा का स्तर में सुधार हुआ है।बीमार पड़ने पर बैगा गांव के डाक्टर के पास जाने लगे। परंतु चिकित्सा सुविधा के अभाव में पंरपरागत गुनिया की शरण उन्हें अब भी लेनी पड़ती है। चुनाव की राजनीति पर बैगा लोग बकायदा बात करते हैं। सरकारी योजनाओं के प्रति बैगा लोग सजग हुए हैं।बैक से ऋण प्राप्त सुविधा का लाभ बैगाओ को दिए जाने का प्रयास हो गया है। आर्थिक हालात सुधारने के लिए मुर्गी,सुअर,गाय,बैल जोड़ी संबंधी ऋण स्वीकृत करता है। सरकार द्वारा दिए गए खाद बीजों का उपयोग बैगा अपने खेतों में करने लगे हैं।यह स्पष्ट है कि बैगा समाज में बदलाव की झलक तीव्रतर है।वे नये की ओर जाने में उत्सुक हैं।बैगा युवक-युवतियां शहर जाते है वहा के बदले वातावरण की ओर आकर्षित होते हैं।बैगा सिनेमा और विडियो देखना पसंद करते हैं। समय-समय पर शासन द्वारा गांव में दिखाये जाने वाले सिनेमा आकर्षण का केन्द्र बनते हैं।इस माध्यम से बैगा जनजाति पर निश्चित ही प्रभाव हुआ है। धीरे धीरे बैगा लोगों के मन में तथाकथित भय जाता रहा।वे अब अजनबी को देखकर दरवाजा बंद नहीं करते।अब नजदीक आकर उनसे बात करते हैं। हिंदी भाषा समझते हैं।बात करने में किसी प्रकार का संकोच नहीं करते। नृत्य और मदिरा उनके मनोरंजन के अंग है।अभी भी स्त्री पुरुष साथ -साथ करमा नृत्य में कोई संकोच नहीं करते नृत्य एवं सज्जा उनकी चित्ताकर्षक होती है। अतः अधिकारियों तथा राजनेताओं के आगमन पर बैगाओ को पंरपरागत स्वागत के लिए तैयार किया जाता है। अतः उनके नृत्य को प्रदर्शन का रुप दिया जा रहा है। बैगा के जीवन में सफलता तथा सुंदरता है।नाच तथा गान उनके जीवन के अभिन्न अंग है। किंतु इस नाच के पीछे भयंकर दरिद्रता तथा निरक्षरता का भीषण नृत्य अभी भी विद्यमान है।गुनी बैगाओ के जड़ी बूटियों का परंपरागत एवं विश्वसनीय ज्ञान होता है।अब भी बैगा उपचार में अपनी पद्ति को प्राथमिकता देता है। चिकित्सा सुविधा का लाभ उन्हें पर्याप्त मात्रा में सुलभ न होने के कारण उनकी पद्ति के उपयोग की लालसा से वंचित रखे हुए हैं। आमतौर पर बैगा मध्यम कद और सुडौल बनावट के होते हैं। रंग सांवला तथा नाक चपटी, होंठ मोंटे तथा मेहनत से गठा शरीर बैगीन सांवली लेकिन कवर्धा मंडला के सीमावर्ती क्षेत्र पीपरखुटा कसाईकुड,सेदूरखार,की पहाड़ी पर रहने वाली बैगिने श्वेतवरण के पाये जातें हैं। बैगा जनजाति में गोदना का महत्व कम होते जा रहा है।और बैगा पुरुष सिर के बाल रखने की प्रथा धीरे धीरे कम होती जा रही है। शिक्षा के क्षेत्र में बैगा समाज काफी पीछे रहा है उस समय लोग पढाई के लिए काफी दूर तक जाना पड़ता है 1977-84मे एकात बैगा ही मैट्रिक पास किया होगा,काफी समय बाद चाणाबजाग के निवासी बुद्ध सिंह बैगा के परिवार में पढा लिखा था और नौकरी में थे।सेदुरखार पंडरिया के सुन्दरसाय बैगा एम हिंदी किया हुआथा।जो नेउर बैगा बालक आश्रम में अधीक्षक का कार्य किया करता था।उस समय बैगा समाज में कबीरधाम जिले में पढ़ा लिखा बैगा था। । सन् 1995मे शरद चन्द्र बेहार मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव बने तो बैगा जनजाति की शिक्षा व संस्कृति के बारे में जानकारी हेतु कबीरधाम जिले के बोड़ला विकास खंड के ग्राम सुकझर पहुंचे और वहां के विश्रामगृह में रात्रि विश्राम किया । वहां बैगा प्रमुख महासिंह बैगा,फदाली बैगा,लमतू बैगा,हरेसिह बैगा,व रुक्मी दादर के सुन्दर साय बैगाओ से चर्चा किया। बैगा प्रमुख के साथ बैठकर खाना खाया,मक्के का पेज प्रमुख था। उन्होंने कहा कि बैगा समाज अपने बच्चों को पढ़ाना शुरू करो हम आपके गांव में स्कूल खोल देते हैं। उसके बाद 1995मे ही उस समय मध्य प्रदेश के तात् कालिक मुख्यमंत्री श्री दिग्विजय सिंह ने सुकझर विश्राम गृह आया और बैगा जनजाति प्रमुख महासिंह बैगा,फदाली,हरेसिह बैगा से मिला और कहा कि जंगल काटना छोड़ दो और अपने बच्चों को पढ़ाओ हम नौकरी देंगे।उसी समय बैगा जनजाति को रेडियो और सायकिलें बंटवाया गया था।हरेसिह बैगा जो बाघमाड़ा के रहने वाले थे। साक्षरता मिशन में पढ़ाई कर पांचवीं पास किया और नौकरी मांगने जिला कार्यालय राजनांदगांव गया और जलवाहक पद पर नियुक्ति आदेश ले कर आदिवासी कन्या आश्रम दलदली में काम किया।हरेसिह बैगा के परिवार में 10लोग नौकरी कर रहे हैं और आज भी हरे सिंह बैगा अपने समाज के पढ़ें लिखे बच्चों को नौकरी और पढ़ाई के बारे में जानकारी देते हैं । वर्तमान में हरे सिंह बैगा एकलव्य विद्यालय तरेगाव जंगल में रसोईया के पद पर कार्यरत हैं।हरे सिंह बैगा को वनौऔषधी के बारे में काफी जानकारी है।वह बैगा समाज के लिए रोल माडल है। निवास क्षेत्र एवं जनांकिकी —————-*———– बैगा जनजाति प्रमुख रुप से छत्तीसगढ़ के कवर्धा, राजनांदगांव, मुंगेली, कोरिया व मरवाही पेन्डा जिलों में निवास करते हैं तथा मध्य प्रदेश के मंडला,डिडौरी, बालाघाट जिले में बैगा जनजाति निवास करते हैं, विशेष पिछड़ी जनजातियों में बैगा जनजाति की जनसंख्या अधिक है। छत्तीसगढ़ में बैगाओ की कुल जनसंख्या 89,744है। इसमें पुरुषों की जनसंख्या 44,847 एवं महिला की संख्या 44897है। इसमें लिंगानुपात 1001है। बैगा जनजाति में साक्षरता 32.17प्रतिशत है, जिसमें पुरुष साक्षरता दर 40.01प्रतिशत एवं महिला साक्षरता दर24.34 प्रतिशत है। महत्त्वपूर्ण तथ्य ————— 1) बैगा जनजाति गोडो के पुजारी (पुरोहित) के रूप में कार्य करते हैं। २) बैगा जनजाति को सर्वाधिक गोदना प्रिय जनजाति के रूप में स्वीकार किया जाता है। ३) बैगा जनजाति में महिलाओं का वस्त्र कपची के रुप में जाना जाता है। ४) बैगा जनजाति में प्रमुख पेय पदार्थ ताड़ी और महुवा से बनी शराब होता है। ५) बैगा जनजाति का प्रमुख देवता बूढादेव है जोकि साल वृक्ष में निवास करते हैं।भूमि की रक्षा के लिए ठाकुर देव जबकि बीमारियों की रक्षा करने के लिए दुल्हादेव की पूजा करते हैं। ६) इसका प्रमुख नृत्य करमा नृत्य हैं। इनके द्वारा बिलमा,सैला,परघौनी,बैगा दशहरा,फाग नृत्य, रीना गीत गाया जाता है। विशेष रूप से कमजोर जनजातियों के विकास के लिए अनुसूचित जनजाति प्रशासन/प्राधिकरण, विशेष रूप से कमजोर जनजातियों के विकास के लिए जनजातीय विकास अभिकरणों/प्रकोष्ठों का गठन 1) विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा विकास अभिकरण कबीरधाम 2) विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा एवं बिरहोर विकास अभिकरण बिलासपुर 3) विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा विकास प्रकोष्ठ, कोरिया 4) विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा विकास प्रकोष्ठ राजनांदगांव 5) विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा विकास प्रकोष्ठ मुंगेली 6) विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा एवं बिरहोर विकास प्रकोष्ठ धरमजयगढ़। जनजातीय विकास: इतिहास, कार्यक्रम व नीतियां _———————_—–_—————— जनजातीय विकास का इतिहास ब्रिटिश काल से प्रारंभ हो गया था। जैसा कि हम जानते हैं कि जनजातियां सुदूर वनों एवं पहाड़ों में निवास करती हैं इस कारण इनकी जीवन पद्यती भी स्वतत्र होती हैं। जंगल पर आश्रित अपने अर्थ व्यवस्था के कारण जल, जंगल, जमीन को अपना अधिकार मानते हैं। ब्रिटिश शासन काल में विभिन्न जनजातियों से सम्पर्क स्थापित करने के लिए 19वी सदी के पूर्वार्द्ध में अंग्रेजों ने ईसाई संगठनों की मदद ली।इनका उद्देश्य जंगलों से प्राप्त होने वाले बेशकीमती लकड़ियां थीं, इनके दोहन में जनजातियों का विरोध न हो इस बात की चिंता ने उनसे सम्पर्क करने पर मजबूर किया। जबकि स्वतंत्रता आंदोलन के सुत्रधारो ने जनजातियों के प्रति भावनात्मक सहानुभूति प्रकट की थी। जैसा कि ऊपर बताया गया है अंग्रेजों को जंगलों से लकड़ी प्राप्त करना था और इसका विरोध जनजाति के लोगों के द्वारा किया जाता था। अंग्रेज शासकों ने जनजातिय क्षेत्रों में बाहरी लोगों को प्रवेश को प्रतिबंधित कर दिया गया जबकि ईसाई संगठनों व वन ठेकेदार को प्रवेश की अनुमति प्राप्त थी। स्वतंत्रता के आसपास उत्तर पूर्वी भारत में विदेशी ताकतों ने भारत के खिलाफ जनजातियों को भड़काने का काम किया।इस प्रकार अलगाव की नीति ने जनजातीयो को राष्ट्र की मुख्य धारा से दूर करने का प्रयास किया। इसके बावजूद यह सत्य है कि मिशनरियों ने जनजातीयो के विकास के लिए कुछ अच्छे कार्य किए। जिनमें प्रमुख स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में किए गये कार्य। उपरोक्त विकास प्रकोष्ठों और अभिकरणों के द्वारा भारत शासन के द्वारा स्वीकृत विकास योजनाओं का संचालन छत्तीसगढ़ी शासन द्वारा किया जा रहा है। कबीरधाम जिले में बैगा जनजाति का विकास बैगा विकास अभिकरण के माध्यम से किया जा रहा है। बैगा विकास अभिकरण का अध्यक्ष बैगा जनजाति से होता है। बैगा विकास अभिकरण में अध्यक्ष के रुप में बोड़ला विकास खंड के भुरसीपकरी के लमतू सिंह बगदरिया दो बार अध्यक्ष रहा, इसके अलावा ददूसिह बैगा, अध्यक्ष रहे। इस समिति के प्रतिनिधियों के सुझाव के आधार पर बैगा जनजातियों के सामाजिक सांस्कृतिक, आर्थिक, शैक्षणिक, स्वास्थ्य,एवं अधोसंरचनात्मक विकास हेतु शासन को प्रस्ताव भेजा गया। बैगा जनजाति प्रकृति पुत्र जो जंगलों को अपना सब कुछ मानते हैं, जंगल में ही पला बढ़ा है और जंगल में ही मर मिटते हैं। बैगा संस्कृति को आज के आधुनिक परिवेश से बचाकर रखना होगा। संकलन_प्रहलाद पात्रे 9893294373 Spread the love Post navigation ABVP ने जिलाधीश को अधिकारी कर्मचारी के समर्थन में दिया मांगपत्र (आंदोलन को जल्द समाप्त कर विद्यालय खोले भुपेश सरकार- ABVP हरेली पर्व के पावन अवसर पर पुलिस अधीक्षक द्वारा किया गया पोदला उरस्कना “पौधारोपण” अभियान-2022 की आज शुभारंभ; केन्द्रीय बलों के अधिकारियों सहित जिले के जनप्रतिनिधि और गणमान्य नागरिक हुए शामिल