कवर्धा

कबीर क्रांति ब्रेकिंग न्यूज़ ,देखिये डी एन योगी की रिपोर्ट  चाय पर चर्चा से सियासी हलचल | कवर्धा कवर्धा में आज हर चाय की दुकान, चौपाल और गलियारे में सिर्फ एक ही चर्चा — संतोष पांडे के पुत्र की शादी… लेकिन चर्चा शादी से ज़्यादा शादी के कार्ड की हो रही है।  शहर से गांव तक सवाल गूंज रहा है शादी आज है, लेकिन  भाजपा के कई पुराने कार्यकर्ता, मंडल पदाधिकारी और स्थानीय नेता निमंत्रण से बाहर?  अंदरखाने नाराज़गी “चुने हुए लोग” ही बुलाए गए — आम धारणा बूथ स्तर के कार्यकर्ता खुद को उपेक्षित मान रहे आवाज़ उठ रही है — “चुनाव में पसीना बहाया, खुशी में भुला दिए गए?” ? जनता भी पूछ रही है क्या अब रिश्ते और पहचान ही न्योते का पैमाना हैं? क्या यह निजी कार्यक्रम है या संगठनात्मक संदेश? क्या इसका असर कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ेगा?  गलियारों की बात जिले के बड़े हिस्से को नज़रअंदाज़ किए जाने की चर्चा ने यह सवाल खड़ा कर दिया है— क्या संगठन में दूरी और भेदभाव बढ़ रहा है?  फिलहाल कवर्धा में चाय के साथ यही मुद्दा परोसा जा रहा है। शादी भले निजी हो, लेकिन निमंत्रण की राजनीति ने इसे सार्वजनिक बहस बना दिया है।  आप क्या सोचते हैं? कमेंट में अपनी राय दें, खबर शेयर करें। कबीर क्रांति ब्रेकिंग न्यूज़ देखिये डी एन योगी की रिपोर्ट

कबीर क्रांति ब्रेकिंग न्यूज़ ,देखिये डी एन योगी की रिपोर्ट
 चाय पर चर्चा से सियासी हलचल | कवर्धा
कवर्धा में आज हर चाय की दुकान, चौपाल और गलियारे में सिर्फ एक ही चर्चा —
संतोष पांडे के पुत्र की शादी…
लेकिन चर्चा शादी से ज़्यादा शादी के कार्ड की हो रही है।
शहर से गांव तक सवाल गूंज रहा है
शादी आज है, लेकिन
भाजपा के कई पुराने कार्यकर्ता, मंडल पदाधिकारी और स्थानीय नेता निमंत्रण से बाहर?
अंदरखाने नाराज़गी
“चुने हुए लोग” ही बुलाए गए — आम धारणा
बूथ स्तर के कार्यकर्ता खुद को उपेक्षित मान रहे
आवाज़ उठ रही है —
“चुनाव में पसीना बहाया, खुशी में भुला दिए गए?”
? जनता भी पूछ रही है
क्या अब रिश्ते और पहचान ही न्योते का पैमाना हैं?
क्या यह निजी कार्यक्रम है या संगठनात्मक संदेश?
क्या इसका असर कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ेगा?
गलियारों की बात
जिले के बड़े हिस्से को नज़रअंदाज़ किए जाने की चर्चा ने यह सवाल खड़ा कर दिया है—
क्या संगठन में दूरी और भेदभाव बढ़ रहा है?
 फिलहाल कवर्धा में चाय के साथ यही मुद्दा परोसा जा रहा है।
शादी भले निजी हो, लेकिन निमंत्रण की राजनीति ने इसे सार्वजनिक बहस बना दिया है।
आप क्या सोचते हैं?
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