धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्महीनता नहीं
श्रीपाल शर्मा की कलम से
कबीर क्रांति | ब्रेकिंग न्यूज़
आज के दौर में हिन्दू-धर्म अथवा हिन्दुत्व की आलोचना करना सबसे आसान काम बन गया है। विपक्ष के अनेक नेताओं—चाहे वह राहुल गांधी हों या अखिलेश यादव—के वक्तव्यों में बार-बार हिन्दू-धर्म या हिन्दुत्व पर प्रहार दिखाई देता है। मानो हिन्दू-धर्म को गाली देना फैशन बन गया हो। हमारे देश में अब उसी व्यक्ति को “सच्चा सेकुलर” या “धर्मनिरपेक्ष” कहा जाने लगा है, जो संस्कृति और प्राचीन परम्पराओं की निंदा करे। इस तरह हिन्दू-विरोध को धर्मनिरपेक्षता का नाम दे दिया गया है—यानी छद्म धर्मनिरपेक्षता ही आज धर्मनिरपेक्षता कहलाने लगी है।
संविधान में ‘सेकुलर’ शब्द को ‘धर्मनिरपेक्षता’ से जोड़ा गया और यह प्रचारित किया गया कि राष्ट्र का धर्म से कोई लेना-देना नहीं होता। जबकि हिन्दू-धर्म को किसी एक परिभाषा में बाँधना सरल नहीं है। पंथ और धर्म में मूल अंतर यही है कि पंथ में एक महापुरुष, एक ग्रंथ और एक विशिष्ट पूजा-पद्धति होती है—जैसे ईसाइयत में ईसा मसीह और बाइबिल, इस्लाम में हज़रत मुहम्मद और क़ुरआन। हिन्दू-धर्म में ऐसी एकरेखीय व्यवस्था नहीं मिलती।
इतिहास के पन्ने पलटें तो पता चलता है कि हिन्दू विचारों व परम्पराओं में पनपे भ्रष्टाचार और अंधविश्वास को दूर करने के लिए समय-समय पर अनेक विद्वानों और संतों ने नए पंथों का मार्ग प्रशस्त किया। गौतम बुद्ध ने बौद्ध-धर्म और महावीर ने जैन-मत का प्रवर्तन किया। इसी क्रम में स्वामी विवेकानन्द, संत तुकाराम और गुरु नानक जैसे महापुरुषों ने भी समाज को नई दिशा दी। लेकिन जैसे-जैसे नए पंथ और मजहब उभरे, वैचारिक कट्टरता को भी बल मिला। पंथ, मजहब और धर्म को एक-दूसरे का पर्याय मान लेने से ही विवाद शुरू हुए।
विदेशी अवधारणा ‘सेकुलरिज़्म’ और भारतीय संदर्भ की ‘धर्मनिरपेक्षता’ को एक मान लेना एक बड़ी भूल रही। यदि संविधान में ‘सेकुलर’ का अनुवाद ‘धर्मनिरपेक्षता’ के स्थान पर ‘पंथ-निरपेक्षता’ या ‘सम्प्रदाय-निरपेक्षता’ किया गया होता, तो शायद इतनी भ्रांतियाँ पैदा ही न होतीं। आज अनेक राजनीतिक दल ‘सेकुलर’ शब्द को हथियार बनाकर हिन्दू या हिन्दुत्व की आलोचना करते हैं। वोट-बैंक की राजनीति में अल्पसंख्यकों को विशेषाधिकार देने की होड़ लगी है, जबकि हिन्दू हितों की बात करने वाले को तुरन्त ‘सम्प्रदायिक’ और ‘धर्मनिरपेक्षता-विरोधी’ घोषित कर दिया जाता है। परिणामस्वरूप ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द हिन्दू-विरोध का पर्याय बनता जा रहा है।
इस संदर्भ में स्वतंत्रता के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनरुद्धार की घटना उल्लेखनीय है। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को मंदिर की आधारशिला रखने का निमंत्रण दिया गया। वे सहर्ष तैयार हो गए। यह जानकर जवाहरलाल नेहरू ने आपत्ति जताई और पत्र लिखकर कहा कि राष्ट्रपति का इस प्रकार शिलान्यास में जाना संविधान के विपरीत होगा। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने असहमति जताई—यहाँ तक कि पद से त्यागपत्र देने को भी तैयार हो गए। अंततः शिलान्यास हुआ और नेहरू ने चुप्पी साध ली।
एक और उदाहरण संयुक्त राज्य अमेरिका का है, जो भारत की तरह एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है। वहाँ राजकीय कार्यक्रमों और उद्घाटनों की शुरुआत अक्सर पादरी द्वारा प्रार्थना से होती है, जिसमें विभिन्न पंथों और राजनीतिक दलों के लोग शामिल रहते हैं—और किसी को आपत्ति नहीं होती। वहाँ के नागरिकों के अनुसार, धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्महीनता नहीं, बल्कि सभी पंथों के प्रति समान सम्मान है।
निष्कर्ष
धर्मनिरपेक्षता का आशय किसी धर्म का विरोध नहीं, बल्कि सभी पंथों के प्रति निष्पक्षता है। इसे धर्महीनता या किसी एक धर्म-विरोध के रूप में प्रस्तुत करना न केवल अवधारणात्मक भूल है, बल्कि सामाजिक समरसता के लिए भी घातक है।
— श्रीपाल शर्मा
कबीर क्रांति | ब्रेकिंग न्यूज़

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