कवर्धा

मनरेगा में बड़ा सवाल: क्या शासन के आदेश फाइलों में दफन? राज्य स्तरीय निर्देशों की अनदेखी पर प्रशासन कटघरे में** कबीर क्रांति ब्रेकिंग न्यूज़ देखिये डी एन योगी की रिपोर्ट

मनरेगा में बड़ा सवाल: क्या शासन के आदेश फाइलों में दफन? राज्य स्तरीय निर्देशों की अनदेखी पर प्रशासन कटघरे में**

कबीर क्रांति ब्रेकिंग न्यूज़ देखिये डी एन योगी की रिपोर्ट

कबीर क्रांति कवर्धा – : महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के अंतर्गत नियुक्त संविदा एवं मानदेय अधिकारी-कर्मचारियों से उनके निर्धारित दायित्वों के अतिरिक्त अन्य विभागीय कार्य लिए जाने की शिकायतों पर राज्य स्तर से जारी स्पष्ट निर्देशों के बावजूद कबीरधाम जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। शासन द्वारा मांगी गई तथ्यात्मक रिपोर्ट की स्थिति आज तक सार्वजनिक नहीं होने से प्रशासनिक जवाबदेही, पारदर्शिता और आदेशों के अनुपालन पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक हो गया है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, 20 मार्च 2026 को महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी परिषद, नवा रायपुर अटल नगर के उप आयुक्त कार्यालय द्वारा कलेक्टर एवं जिला कार्यक्रम समन्वयक कबीरधाम को पत्र प्रेषित कर सात दिवस के भीतर विस्तृत प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए थे। यह कार्रवाई मुख्यमंत्री सचिवालय को प्राप्त शिकायतों के आधार पर की गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि मनरेगा के लिए नियुक्त कर्मचारियों से योजना के मूल दायित्वों से हटकर अन्य प्रशासनिक एवं विभागीय कार्य कराए जा रहे हैं।

यदि शिकायतों में वर्णित तथ्य सत्य हैं, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही का मामला नहीं बल्कि मनरेगा के संचालन संबंधी दिशा-निर्देशों और शासन की मंशा की प्रत्यक्ष अवहेलना माना जाएगा। मनरेगा जैसी महत्वाकांक्षी ग्रामीण विकास योजना के लिए नियुक्त मानव संसाधनों का अन्य कार्यों में उपयोग न केवल योजना की कार्यक्षमता को प्रभावित करता है, बल्कि रोजगार सृजन और विकास कार्यों की निगरानी जैसी मूलभूत जिम्मेदारियों को भी कमजोर करता है।

सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि जब राज्य स्तरीय कार्यालय ने सात दिवस की स्पष्ट समय-सीमा निर्धारित की थी, तब महीनों बीत जाने के बाद भी मामले की वास्तविक स्थिति अस्पष्ट क्यों बनी हुई है। यदि जांच पूर्ण हो चुकी है तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की गई? यदि जांच लंबित है तो विलंब के लिए उत्तरदायी कौन है? और यदि आदेश पर कोई प्रभावी कार्रवाई ही नहीं हुई, तो क्या शासन के निर्देश महज औपचारिकता बनकर रह गए हैं?

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि इसमें सीधे मुख्यमंत्री सचिवालय एवं राज्य स्तरीय परिषद का हस्तक्षेप शामिल है। इसके बावजूद जिला प्रशासन की ओर से अपेक्षित गंभीरता और त्वरित कार्रवाई का अभाव प्रशासनिक अनुशासन तथा जवाबदेही व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

मनरेगा देश की सबसे बड़ी ग्रामीण रोजगार योजनाओं में से एक है, जिसके माध्यम से लाखों ग्रामीण परिवारों को रोजगार उपलब्ध कराया जाता है। योजना के सफल क्रियान्वयन में तकनीकी सहायक, रोजगार सहायक, कार्यक्रम अधिकारी तथा अन्य संविदा कर्मचारी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे कर्मचारियों को उनके मूल दायित्वों से विचलित कर अन्यत्र उपयोग में लाना योजना की मूल भावना और उद्देश्य दोनों के साथ अन्याय माना जा सकता है।

हैरानी की बात यह भी है कि राज्य स्तर से जारी पत्र में संबंधित पक्षों को अवगत कराने तथा समयबद्ध प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के स्पष्ट निर्देश दिए गए थे, किंतु आज तक शिकायतकर्ताओं अथवा आमजन के समक्ष कोई अधिकृत जानकारी प्रस्तुत नहीं की गई है। इससे पूरे प्रकरण में गोपनीयता, पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर संदेह गहराने लगे हैं।

प्रशासन की लगातार बनी हुई चुप्पी अब अनेक आशंकाओं को जन्म दे रही है। क्या जांच रिपोर्ट तैयार होकर राज्य कार्यालय को भेजी जा चुकी है? यदि हां, तो उसके निष्कर्ष क्या हैं? यदि नहीं, तो आदेश की अवहेलना के लिए अब तक जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई? क्या मामला जानबूझकर लंबित रखा जा रहा है अथवा इसे दबाने का प्रयास हो रहा है? ऐसे कई सवाल हैं जिनके उत्तर अब तक सामने नहीं आ सके हैं।

ग्रामीण विकास और रोजगार सुरक्षा की आधारशिला मानी जाने वाली मनरेगा योजना में यदि नियमों की अनदेखी, प्रशासनिक शिथिलता और शिकायतों के निराकरण में उदासीनता बनी रहती है, तो इसका सीधा असर योजना की विश्वसनीयता और जनविश्वास पर पड़ेगा। यह मामला शासन की मंशा और जमीनी स्तर पर उसके क्रियान्वयन के बीच बढ़ती खाई को भी उजागर करता है।

फिलहाल, राज्य स्तर से मांगी गई रिपोर्ट, निर्धारित समय-सीमा और गंभीर शिकायतों के बावजूद परिणाम शून्य दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली, शासनादेशों के अनुपालन तथा जवाबदेही निर्धारण को लेकर उठ रहे सवालों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अब सभी की निगाहें राज्य शासन पर टिकी हैं कि वह इस प्रकरण में क्या रुख अपनाता है और आदेशों की कथित अवहेलना के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही कब और कैसे सुनिश्चित की जाती है।

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