पचराही(कंकालीन) का पुरातात्विक वैभव…
कवर्धा,कबीर क्रांति

कवर्धा,,पचराही जिला मुख्यालय कवर्धा से 45 किलोमीटर तथा ब्लॉक मुख्यालय बोड़ला से 17 किलोमीटर की दूरी पर ग्रा.पं.-बोदा 03 में उत्तर-पश्चिम दिशा में हाफ नदी के दाहिने किनारे पर स्थित है। पचराही वह स्थान है जिसने जिले वा प्रदेश ही नहीं बल्कि देश को नयी पहचान दी है। पचराही का तो सर्वप्रथम नाम ही आकर्षित करता है।एक सामान्य अर्थ जहां पांच रास्ते आकर मिलत हो या जहां से पांच रास्ते निकलते हो।लोक मान्यता में ये पांच रास्ते जिनको जोड़ते हैं; वे हैं- रतनपुर, सहसपुर, भोरमदेव, मंडला और लांझी। उत्खनन से प्राप्त एवं पुरातात्विक अवशेषों से यह बात सही लगती है कि यहां अपेक्षाकृत बड़ी बसाहट रही होगी। 1500 वर्ष पुराने स्वर्ण-रजत सिक्कें, महल,मंदिर, औजार ,बर्तन, खिलौने एवं विभिन्न दुर्लभ मूर्तियो के प्राप्त अवशेष यहां सम्प्पन्न व्यक्तियों अथवा राजपुरुषों के निवास करने को भी प्रमाणित करते हैं,तथा 7 शिवमंदिर एवं 20 तालाबों की श्रृंखला भी मौजूद हैं।पचराही के पुरातात्विक अवशेषों की जानकारी लोकमानस के अलावा इतिहासकारों/सर्वेक्षणकर्ताओं को भी काफी समय से रही है। आस-पास के लोक-जीवन मे प्रसिद्ध कंकाली टीला देवी मूर्ति के कारण ‘कंकालीन देवी’ के नाम से जाना जाता रहा है।
*प्रथम सर्वेक्षण-*
इस क्षेत्र का सर्वप्रथम सर्वे सर.आर.जेनकिन्स द्वारा(1825 के लगभग) किया गया, जिसकी रिपोर्ट ‘एशियाटिक रिसर्चेस, वॉल्यूम 15’ में प्रकाशित हुआ। उन्होंने अपने रिपोर्ट में दो शिलालेखों की प्राप्ति का उल्लेख किया है, जो उन्हें ध्वस्त मंदिर के पास प्राप्त हुआ था। इनमें से एक तीन हिस्सों में खण्डित था जिसमे कोई तिथि अंकित नही थी। दूसरे शिलालेख में 849 अंकित था।
*द्वितीय सर्वेक्षण-*
जेनकिन्स के बाद सर अलेक्जेंडर कंनिंगघम ने 1881-82 में इस क्षेत्र का पुरातात्विक सर्वेक्षण किया जो आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के वॉल्यूम 17 में ‘रिपोर्ट ऑफ अ टूर इन द सेंट्रल प्रोविंसेस एंड लोवर गंगेटिक दोआब’ के नाम से प्रकाशित हुआ।कंनिंगघम ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि “कंकाली की मूर्ति ध्वस्त मंदिर के बाहर रखा हुआ है, जो एक वीरान किले के अंदर है”। कंकाली टीला(पचराही) ग्राम बोरिआ के निकट होने के कारण बहुत जगह पचराही की अपेक्षा बोरिआ इलाका (ब्रिटीश काल में) नाम का उल्लेख हुआ है।कंनिंगघम को जेनकिन्स द्वारा उल्लेखित ‘तीन हिस्सों में खंडित’ शिलालेख तथा 849 अंकित शिलालेख भी प्राप्त नही हो सका।लेकिन उन्हें एक शिलालेख प्राप्त हुआ जिसे उन्होंने सम्वत 910 पढ़ा।यह शिलालेख दाढ़ीयुक्त हाथ जोड़े राजपुरुष की मूर्ति के पादतल(चौकी)में अंकित है। श्री धानूलाल श्रीवास्तव (अष्टराज अंभोज,1925) के अनुसार यह वही अभिलेख है जिसे जेनकिन्स ने 849 पढ़ा था। बहूत कम लोगों को यह मालूम होगा कि यह अभिलेख युक्त मूर्ति वर्तमान में बूढा महादेव मंदिर कवर्धा में है।
इसके अलावा एक उन्हें एक बिना तिथि का अभिलेख मिला जिसमे “श्री जसराज देव” अंकित है।यह मूर्ति भी बूढा महादेव मंदिर कवर्धा में रखी हुई है। तीसरा अभिलेख जो उन्होंने देखा उसमे केवल ‘देवदास’ अंकित है।यह अभिलेख धानू लालश्रीवास्तव के समय (1925)तक पचराही में था ; उनके द्वारा देखे गये चौथे अभिलेख “जोगी श्री मगरध्वज 700” अंकित है। यह अभिलेख वर्तमान में पचराही में ही है।श्री धानूलाल श्रीवास्तव( उक्त बातें इन्होंने राय बहादुर हीरालाल की ‘इस्क्रिप्सनऑफ सी. पी. एंड बरार’ 1916 से लिया है)के अनुसार पचराही(बोरिआ इलाका) से दो सती स्तंभ भी लाया गया है, जो कवर्धा में करपात्री पार्क के पास स्थित ‘राम मंदिर(छोटे मंदिर)के मंडप में लगा है।
उनके अनुसार एक स्तंभ में “मार्ग शीर्ष शुक्ल द्वादशी सोमवार सम्वत 1414 अर्थात 5 दिसम्बर सन 1356 ई. सोमवार महाराजा श्री रामदेव का शासनकाल लिखा है। तथा दूसरे में ज्येष्ठ सुदी 13 संवत 1422 सोमवार अर्थात 13 मई सन 1364 ई.अंकित है।इसमें यह उल्लेख है कि परलोकगत नामक महादेव(सम्भवतः महादेव नामक परलोकगत) की तीन पत्नियां थी (1) मेताई (2) नौरवाई (3) दिवमाई। इनमें से केवल मेताई सती हो गई और यह स्तंभ उसके सम्मानार्थ निर्माण किया गया”। इन स्तंभों को आज भी मंदिर में देखा जा सकता है। इसके अलावा वहां और भी अनेक स्तंभ और मूर्तियां हैं, लेकिन वर्तमान में सब के ऊपर काला पेंट कर देने के कारण न तो उत्कीर्ण आलेख दिख रहे हैं, न ही यह समझ आ पाता है कि कौन प्राचीन अवशेष है और कौन अर्वाचीन!।
इसके बाद एक लंबे अर्से तक कोई नयी जानकारी उभर कर नही आ सकी। ज्ञात तथ्यों के आधार पर ही लेख आदि लिखे जाते रहें।खैरागढ़ विश्व विद्यालय से सम्बद्ध श्री सीताराम शर्मा ने अपने शोध-कार्य के दौरान इस क्षेत्र के बिखरे मूर्तियों, प्राचीन तालाबों आदि का अध्ययन कर 1990 में ‘भोरमदेव क्षेत्र:पश्चिम दक्षिण कोशल की कला’ नामक पुस्तक प्रकाशित की।लगभग इसी समय श्री शरद हलवाई अपने निजी रुचि के तहत इस क्षेत्र के पुरातत्विक अवशेषों पर अखबारों में लिखते रहें।
*पुरातात्विक उत्खनन-*
पचराही के इतिहास में महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब बिधिवत रूप से यहां के पुरातत्विक स्थलों का उत्खनन हुआ। यह उत्खनन 2007-08 के दौरान श्री सोबरन सिंह यादव के निर्देशन और श्री अतुल प्रधान के नेतृत्व में हुआ।इस उत्खनन से पचराही के इतिहास को नई रौशनी मिली, और इतिहास के कई कड़ियों को जोड़ने में मदद मिली। उत्खनन हेतू पचराही में 84 एकड़ की भूमि है,अभी भी कुछ हिस्सा उत्खनन हेतू शेष है।अवश्य कोई महत्वपूर्ण प्रस्तर अभिलेख प्राप्त नही हो सका मगर विभिन्न राजाओं के सिक्के , खिलौने,बर्तन हथियार,महल एवं मूर्ति प्राप्त हुए हैं, जिनसे महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त हुई हैं।इस उत्खनन से प्राप्त अवशेषों को उन्होंने पांच कालों में विभाजित किया है – (1) पूर्व ऐतिहासिक (2) उत्तर गुप्त कालीन(पांडुवंशी) (3) कलचुरी कालीन (4) फणि नागवंशी कालीन (5) इस्लामिक ।
*उत्खनन में प्राप्त विभिन्न अवशेष-*
पूर्व ऐतिहासिक काल के अवशेषों में माइक्रोलीथिक औजार जैसे लुनेट (अर्धचंद्राकार), ट्रेपेज(समलंब आकार), स्क्रेपर(खुरचनी), पाइंट(नोक) आदि प्राप्त हुए हैं। उत्तर गुप्तकालीन अवशेषों में कोई लिखित साक्ष्य प्राप्त नही हुआ है मगर उस काल की बड़े वर्गाकार ईंटें प्राप्त हुई हैं। साथ ही पत्थर का बैल, टेराकोटा, तथा कई पट्टिकाएं प्राप्त हुई हैं जिनमे पार्वती, कार्तिकेय, गणेश और कई अचिन्हित आकृतियां उत्कीर्ण हैं।
कलचुरी कालीन पर्याप्त अवशेष प्राप्त हुए हैं, जिनमे ईंटो से बने रहवास,किलेबंदी के अवशेष,लोहे और तांबे के समान, चीनी मिट्टी के बर्तन बनाने का कारखाना, सिक्के और मूर्तियां प्राप्त हुई हैं।
सिक्को में रत्नदेव का स्वर्ण सिक्का,प्रतापमलदेव के दो स्वर्ण सिक्के, ताम्बे के सिक्के रत्नदेव के दो, पृथ्वी देव् के एक, जाजल्यदेव के दो, प्राप्त हुए हैं।
पचराही में फणि नागवंशियों के भी पर्याप्त अवशेष प्राप्त हुए हैं जैसे- सिक्कें, मूर्तियां,वास्तु रूपांकन, भवन अवशेष,टेराकोटा, आदि।इनमें नक्कड़ देव् का स्वर्ण सिक्का, श्रीधरदेव का रजत सिक्का, यशोराज देव् का रजत सिक्का, जयत्रपाल के दो रजत सिक्के। फणि नागवंशियों के सिक्के पहली बार प्राप्त हुए हैं, अभी तक उनके विवरण केवल शिलालेखों में प्राप्त हुए थे।
उत्खनन में इस्लामिक शासन काल के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं, जो अपने आप मे महत्वपूर्ण हैं। इनमें अलाउद्दीन खिलजी के दो ताम्र सिक्कें(1308-09ई.के)प्राप्त हुए हैं।सम्भवतः यह व्यापार से आये होंगे।एक ब्रिटिश कालीन रजत सिक्का भी प्राप्त हुआ है, जो बाद के समय यात्रा करने वाले व्यक्तियों द्वारा आये होंगे।
*जीवाश्म(फॉसिल) के अवशेष*
पचराही उत्खनन में मोलस्का फाईलम का एक जीवाश्म (घोंघा) प्राप्त हुआ है,जो सर्पिलाकार(1-2से.मी.) है। श्री मैनकर दत्त(उप संचालक,भूगर्भशास्त्र, रायपुर) के अनुसार यह जुरासिक काल के मोलस्का (20.3-13.3 करोड़ साल पूर्व) के समान है अर्थात प्राप्त जीवाश्म 15 करोड़ वर्ष पुराना है। इससे पुरातत्त्ववेत्ता मानते हैं कि यह क्षेत्र करोड़ों वर्ष पहले समुद्र था अथवा सम्भवतः किसी और क्षेत्र से यहां पहुंचा होगा।जो राज्य ही नहीं बल्कि देश के लिए एक नई खोज रही है।
*गोंडवाना राज्य चिन्ह-*
पचराही उत्खनन में अनेक गोंडवाना राज्य प्रतीक चिन्ह एवं प्रतिमूर्ति भी मिले है। जो संभवत: फणीनागवंशी राजाओं के शासनकाल का है। चूंकि यह क्षेत्र पुरातन समय में आदिवासी बाहुल्य रहा है एवं वर्तमान में भी है। जो निश्चित शोध का विषय है।
*सबसे छोटी दुर्लभ मूर्ति-*
पचराही में ऐसी ऐसी चिजें मिली है जो विश्व में कहीं भी नहीं मिली है।खुदाई के दौरान यहां हजारों वर्ष पुराने चामुण्डा देवी की मूर्ति मिली है यह अब तक मिले सभी मूर्तियों में सबसे छोटी है इतनी छोटी मूर्ति कहीं भी नहीं मिली है।
*अद्भुत सिध्द चमत्कारिक हनुमान मूर्ति-*
पचराही कंकालीन में एक दुर्लभ सिद्ध चमत्कारिक हनुमान मंदिर है जो की दुनिया में कहीं नहीं है जिसमे हनुमान जी एवं मां कामाख्या देवी संयुक्त रुप में प्रर्दशित है तथा जिसमें हनुमान जी अपने पैरों से अहिरावण को दबाये हुए हैं। मान्यता है कि इस मंदिर में सप्ताह के सभी दिन दोनों शक्तियो का आशीर्वाद दर्शानार्थी भक्तों को प्राप्त होता है।एवं प्रत्येक शनिवार को बजरंगबली, मां कामाख्या एवं शनिदेव जी तीन महाशक्तियों का आशीर्वाद दर्शानार्थियो को प्राप्त होता है। अतः यह मंदिर दुनिया में विख्यात हैं तथा रहस्मयी एवं दुर्लभ है।
*कंकाली टीला(कंकालीन)-*
पचराही का पुरातत्व कंकाली टीला के नाम से ही अधिक चर्चित रहा है। कंनिंनघम से लेकर वर्तमान उत्खनन तक इसी नाम से जाना जाता रहा। अधिकांश पुरातत्विक सामग्री इसी के आस-पास बिखरे हुए थे।टीले के उभार को देखकर ही अंदाजा हो जाता था कि यहां कोई स्थापत्य संरचना अवश्य होगी। उत्खनन से पूर्व टीले में स्थापत्य खण्ड के बीच एक मूर्ति थी जिसे कंकाली देवी के नाम से पूजा जाता रहा।यह मूर्ति वर्तमान में पचराही संग्रहालय में अवस्थित है। मूर्ति का शिरोभाग खण्डित है। आशीर्वाद मुद्रा में बैठे हुए यह मूर्ति हमारी समझ मे यह कोई देव(पुरुष) है। इसका वक्ष स्थल सपाट है।लोकमानस में देव मूर्ति पर ‘देवी’ का आरोपण कोई असामान्य घटना नही है; मगर कनिंनघम ने अपने सर्वे रिपोर्ट में जिस देवी मूर्ति का उल्लेख किया है; वह यह मूर्ति प्रतीत नही होती। उन्होंने लिखा है
“The fort in which the temple stands is square of 550 feet side. The figure of Kankari Devi is 3.5 feet high, and has 18 arms, which hold amongst other objects, a bow and arrow, a shield, a trident, a human head etc. There is also a standing figure of Siva, 4 feet, in height, with a trident and close by a figure of Ganesa.
स्पष्ट है पहले वहां कंकाली की मूर्ति थी, जो अब वहां नही है। इसके अलावा उल्लेखित शिव मूर्ति का भी पता नही चलता।
कंकाली टीला के उत्खनन से उत्तर गुप्तकालीन (पांडुवंशी)ईंटो की संरचना प्राप्त हुई है जिसमे दो कक्ष हैं(3.9मी. गहरे)और बाहर एक प्रदक्षिणापथ।बाद में कलचुरी काल मे इसके ऊपर पत्थर से निर्माण कार्य के साक्ष्य मिले हैं। ईंटो की सरंचना के बारे में स्थिति स्पष्ट नही है मगर कलचुरी काल मे पत्थर का निर्माण कार्य अभिलेख में उल्लेखित शिव मंदिर हो सकता है, जो मंदिर के ध्वस्त हो जाने के बाद के काल मे कंकाली की मूर्ति के कारण कंकालीन मंदिर के नाम से चर्चित हो गया हो। वैसे यहां उत्खनन में अन्य स्थलों पर भी शिव मंदिर होने के साक्ष्य मिले हैं।
इस तरह से पचराही(कंकालीन) की पुरातात्विक वैभव अतुलनीय एवं विशाल है जो विश्व विख्यात है। अवश्य ही इस प्राचीन हमारी धरोहर को पुरातत्त्व विभाग (शासन) एवं क्षेत्र वासियों के द्वारा संरक्षण एवं संवर्धन किया जाना आवश्यक है।
…..?? *जय-मां कंकालीन*??……

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