कबीर क्रांति ब्रेकिंग न्यूज़ देखिये डी एन योगी की रिपोर्ट** कमला हॉस्पिटल में सोनोग्राफी नहीं—बीमारों को 3 किमी दूर दौड़, क्या निजी एम्बुलेंस को फायदा पहुंचाने की साज़िश!

कबीर क्रांति ब्रेकिंग न्यूज़ देखिये डी एन योगी की रिपोर्ट**
कमला हॉस्पिटल में सोनोग्राफी नहीं—बीमारों को 3 किमी दूर दौड़, क्या निजी एम्बुलेंस को फायदा पहुंचाने की साज़िश!
कवर्धा। राजनांदगांव बायपास चौक स्थित कमला हॉस्पिटल को “सर्व सुविधा” युक्त समझकर मरीज इलाज कराने जाते है , लेकिन हकीकत मरीजों के लिए भारी पड़ रही है। अस्पताल में सोनोग्राफी सुविधा उपलब्ध नहीं होने के कारण मरीजों को दर्री पारा स्थित सिटी केयर डायग्नोस्टिक सेंटर भेजा जाता है। दोनों स्थानों के बीच लगभग तीन किलोमीटर की दूरी से भी ऊपर है। जांच के लिए जाना और रिपोर्ट लेकर वापस लौटना—कुल मिलाकर 6 किलोमीटर से भी अधिक की भागदौड़।
भीषण गर्मी में, जब मरीज पहले से बीमारी से जूझ रहा हो, यह दूरी किसी सजा से कम नहीं। गर्भवती महिलाएं, बुजुर्ग और गंभीर रोगी खुले आसमान के नीचे धूप में भटकने को मजबूर हैं। बड़ा भवन, आकर्षक बोर्ड और लंबी-चौड़ी सुविधाओं की सूची—लेकिन बुनियादी जांच तक अपने परिसर में नहीं।
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह व्यवस्था महज लापरवाही है या फिर इसके पीछे कोई और मंशा ।
स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि बाहर भेजे जाने वाले मरीजों के लिए निजी एम्बुलेंस की सेवाएं सक्रिय रहती हैं। क्या यह पूरा तंत्र निजी एम्बुलेंस को फायदा पहुंचाने की कवायद तो नहीं। यदि ऐसा है तो यह बेहद गंभीर मामला है, जिसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है।
Clinical Establishments (Registration and Regulation) Act, 2010 के तहत पंजीकृत अस्पतालों को अपनी घोषित सेवाओं के अनुरूप बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना अनिवार्य है। यदि अस्पताल गंभीर रोगों के उपचार का दावा करता है, तो आवश्यक डायग्नोस्टिक सुविधा का अभाव नियमों की मंशा के विपरीत माना जा सकता है।
वहीं Consumer Protection Act, 2019 के प्रावधानों के अनुसार भ्रामक विज्ञापन और अधूरी जानकारी देना “अनुचित व्यापार व्यवहार” की श्रेणी में आ सकता है। यदि मरीज को यह विश्वास दिलाया जाता है कि सभी जांच एक ही परिसर में होंगी, लेकिन उसे बाहर भटकना पड़े, तो यह पारदर्शिता पर सीधा सवाल है।
स्वास्थ्य विभाग के दिशा-निर्देश स्पष्ट कहते हैं कि संवेदनशील और आपात मरीजों को अनावश्यक रेफरल से बचाया जाए। फिर सामान्य सोनोग्राफी के लिए 3 किलोमीटर दूर क्यों भेजा जा रहा है क्या अस्पताल के लाइसेंस में सोनोग्राफी सुविधा दर्ज है यदि नहीं, तो क्या इसका स्पष्ट उल्लेख परिसर में किया गया है।
मरीजों का कहना है कि इलाज से पहले ही उन्हें थकान और परेशानी झेलनी पड़ रही है। आर्थिक बोझ अलग—आना-जाना, एम्बुलेंस या वाहन का खर्च और समय की बर्बादी।
अब जिम्मेदार अधिकारियों से सीधा सवाल है—क्या इस व्यवस्था की जांच होगी? क्या यह पता लगाया जाएगा कि निजी एम्बुलेंस को लाभ पहुंचाने के लिए मरीजों को बाहर भेजा जा रहा है या नहीं।
स्वास्थ्य सेवा में संवेदनशीलता और पारदर्शिता सर्वोपरि होनी चाहिए। यदि “सर्व सुविधा” का दावा महज दिखावा है, तो यह मरीजों के साथ अन्याय है। प्रशासन को चाहिए कि तत्काल संज्ञान लेकर सच्चाई सामने लाए, वरना मरीजों की यह 6 किलोमीटर की पीड़ा सवाल बनकर खड़ी रहेगी।


