केशधारी सिख हिन्दू समाज के अभिन्न अंग — एक विचार श्रीपाल शर्मा, पत्रकार

केशधारी सिख हिन्दू समाज के अभिन्न अंग — एक विचार
श्रीपाल शर्मा, पत्रकार
प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय ही अंग्रेजों को यह आभास हो गया था कि यदि भविष्य में उनके शासन के लिए कोई सबसे बड़ा खतरा होगा, तो वह भारत का हिन्दू समाज होगा। इसी सोच के तहत उन्होंने “फूट डालो और राज करो” की नीति अपनाई और हिन्दू समाज को जाति, बिरादरी और पंथ के आधार पर बांटने का प्रयास किया।
इसी रणनीति के तहत अंग्रेजों ने केशधारी सिखों को शेष हिन्दुओं से अलग पहचान देने की शुरुआत की। जनगणना, मताधिकार, नौकरी और विधानसभा में अलग व्यवस्थाओं के माध्यम से उन्हें राजनीतिक रूप से अलग करने का प्रयास किया गया।
1984 में हुए ऑपरेशन ब्लूस्टार और उसके बाद की घटनाओं ने सिख समाज में आक्रोश को जन्म दिया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या और उसके बाद हुए दंगों में कई निर्दोष सिखों की जान गई। इन घटनाओं का फायदा अलगाववादी ताकतों ने उठाया और खालिस्तान आंदोलन को हवा दी, जिससे हिन्दू-सिख संबंधों में दूरी बढ़ी।
आज़ादी के बाद भी कुछ अकाली नेताओं के मन में यह प्रश्न उठता रहा कि जैसे मुसलमानों को पाकिस्तान मिला, वैसे सिखों को क्या मिला। इसी सोच ने अलगाववाद के बीज बोए, जो आगे चलकर एक बड़ी समस्या बन गई।
इतिहास बताता है कि मुगलकाल में अत्याचारों के खिलाफ गुरु गोविंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की, जो एक प्रकार का सैन्य संगठन था। उन्होंने हिन्दू परिवारों से आह्वान किया कि वे अपने पुत्रों को धर्म रक्षा के लिए समर्पित करें। इस प्रकार खालसा पंथ में शामिल होने वाले अनेक लोग हिन्दू परिवारों से ही थे।
खालसा पंथ में “पंच ककार” — केश, कंघा, कृपाण, कड़ा और कच्छा — धारण करना अनिवार्य किया गया। “सिख” शब्द स्वयं “शिष्य” का ही रूप है।
इतिहास के अनेक उदाहरण बताते हैं कि सिख गुरुओं ने हिन्दू धर्म और समाज की रक्षा के लिए महान बलिदान दिए।
गुरु गोविंद सिंह जी का प्रसिद्ध वचन है —
“सकल जगत में खालसा पंथ गाजे, जगे हिन्दू धर्म, सकल भंड भाजे।”
यह लेख एक विचार प्रस्तुत करता है, जिसका उद्देश्य इतिहास और समाज पर विमर्श करना है।
— श्रीपाल शर्मा, पत्रकार
संपादक: डी. एन. योगी, कबीर क्रांति




