कवर्धादुर्ग

ताको नाम कबीर, कबीर पूणिर्मा

ताको नाम कबीर, कबीर पूणिर्मा

भारत में कोई ऐसा व्यक्ति हुआ है, जिसके साहित्य पर सबसे अधिक पीएचडी हुई हैं, उसका नाम कबीर है। कबीर भारत की संत परम्परा से आते हैं और आडम्बर के विरुद्ध समाज को मथ डालते हैं। उसके पश्चात जो नवनीत निकल कर आता है, उसे कबीर विचार धारा कहा जाता है। पांच शतियों के पश्चात आज भी कबीर प्रासंगिक हैं। उनकी साखियाँ, रमैनी, दोहे, उलटबांसियाँ जनमानस में कहावतों की तरह प्रचलित हैं।
 आज ज्येष्ठ पूर्णिमा है जिसे लोग कबीर पूर्णिमा के नाम से भी जानते है, संत कबीर जन्म लहरतारा के पास जेठ पूर्णिमा को हुआ था। उनके पिता नीरू नाम के जुलाहे थे। वे किसी भी सम्प्रदाय और रूढियों की परवाह किए बिना खरी बात करते थे।
कुछ लोगों का कहना है कि वे जन्म से मुसलमान थे और युवा अवस्था में स्वामी रामानंद के प्रभाव से उन्होंने हिन्दू धर्म की विशेषताओं को स्वीकारा। कबीर ने हिन्दु, मुसलमान का भेद मिटाकर हिन्दु भक्तों तथा मुसलमान फकीरों के साथ सत्संग किया और दोनो की अच्छी बातों को आत्मसात किया।
कबीर पढ़े लिखे नहीं थे पर उनकी बोली बातों को उनके अनुयायियों ने लिपिबद्ध किया जो लगभग ८० ग्रंथों के रूप में उपलब्ध है। कबीर ने भाईचारे, प्रेम और सद्भावना का संदेश दिया है। उनके प्रेरक एवं जीवन निर्माणकारी उपदेश उनकी साखी, रमैनी, बीजक, बावन अक्षरी, उलट बासी में देखे जा सकते हैं।

कबीर सुधारवादी संत हैं, उन्होंने हिन्दू- मुसलमान दोनों के ही साम्प्रदायिक, रूढग्रस्त विचारों की आलोचना की । और कहा भगवान को पाने के लिए मन से पवित्र होना आवश्यक है । भगवान न मंदिर में है, न मस्ज्जिद में है वह तो हर मनुष्य में है । अपनी सहज अभिव्यक्ति में कबीर ने लिखा –
 ना जाने तेरा साहिब कैसा है ।
मसजिद भीतर मुल्ला पुकारै, क्या साहिब तेरा बहिरा है?
चिंउटी के पग नेवर बाजे, सो भी साहिब सुनता है ।
पंडित होय के आसन मारै लम्बी माला जपता है ।
अन्दर तेरे कपट कतरनी, सो भी साहब लखता है ।
कंकर पत्थर जोड़ के मस्जिद दी बनाय ।
ता पर मुल्ला बांग दे, बहरा हुआ खुदाय ।।
दिन में रोजा रखत हो, रात हनत हो गाय ।
यह तो खून औ बंदगी, कैसे खुशी खुदाय ।।

ऐसे ही हिन्दुओं के अंधविश्वासों पर उन्होंने चोट की । धर्म के क्षेत्र में आडम्बरों का कबीर ने खुला विरोध किया

 पाहन पूजे हरि मिले – तो मैं पूजूं पहार ।
ताते तो चाकी भली, पीस खाय संसार ।।
मूंड मुंड़ाए हरि मिले, सबही लेऊँ मुंड़ाए ।
बार-बार के मूंड़ ते भेड़ न बैकुंठ जाए ।।

महामना संत कबीर भारतीय संत परंपरा और संत-साहित्य के महान हस्ताक्षर हैं। हमारे यहां संत-साहित्य का एक विशिष्ट महत्व रहा है। क्योंकि इस साहित्य ने कभी भोग के हाथों योग को नहीं बेचा, धन के बदले आत्मा की आवाज को नहीं बदला तथा शक्ति और पुरुषार्थ के स्थान पर कभी संकीर्णता और अकर्मण्यता को नहीं अपनाया। ऐसा इसलिये संभव हुआ क्योंकि कबीर अध्यात्म की सुदृढ़ परंपरा के संवाहक भी थे।
 कबीर कहते हैं कि धरती पर सभी कष्टों की जड़ वासना है, इसके मिटते ही चिंता भी समाप्त हो जाती है और शांति स्वमेव आने लगती है । कबीर के कहने का तात्पर्य है कि पूजा- पाठ साधना कोई शुष्क चीज नहीं है, बल्कि इसमें आनंद है, तृप्ति है और साथ ही सभी समस्याओं का समाधान। इसलिए इसको जीवन में सर्वोपरि स्थान देना चाहिए । साधना के प्रति लोगों के हृदय में आकर्षण भाव लाने हेतु उन्होंने अपना अनुभव बताया ।

इस घट अंतर बाग बगीचे, इसी में सिरजन हारा,
इस घट अंतर सात समुदर इसी में नौ लख तारा ।
 सत्व, रज, तम तीनों गुणों को छोड़कर वे त्रिगुणातीत बन गए थे। वे निर्गुण रंगी चादरिया रे, कोई ओढ़े संत सुजान को चरितार्थ करते हुए सद्भावना और प्रेम का गंगा को प्रवाहित किया। उन्होंने इस निर्गुणी चदरिया को ओढ़ा है। उन्हें जो दृष्टि प्राप्त हुई है, उसमें अतीत और वर्तमान का वियोग नहीं है, योग है। उन्हें जो चेतना प्राप्त हुई, वह तन-मन के भेद से प्रतिबद्ध नहीं है, मुक्त है।

उन्हें जो साधना मिली, वह सत्य की शल्य-चिकित्सा करती है। सत्य की निरंकुश जिज्ञासा ही उनका जीवन-धर्म रहा है। वही उनका संतत्व रहा। वे उसे चादर की भांति ओढ़े हुए नहीं हैं, बल्कि वह बीज की भांति उनके अंतस्तल से अंकुरित होता रहा है। कबीर एक ऐसे संत है, जिनके लिये पंथ और ग्रंथ का भेद बाधक नहीं। उनका मार्ग सहजता है, यही कारण है कि उन्होंने सहज योग का मार्ग सुझाया। वे जाति-पांति के भेदभावों से मुक्त एक सच्चा इंसान थे। उन्होंने अपने आध्यात्मिक चिंतन का सार इन अनुभूत शब्दों में व्यक्त किया है कि

 क्या गाएं क्या लिखि बतलाए, क्या भ्रमे संसार।
क्या संध्या तपंन के कीन्हें जो नहि तत्व विचारा।।

महात्मा कबीर समाज में फैले आडम्बरों के सख्त विरोधी थे। उन्होंने लोगों को एकता के सूत्र का पाठ पढ़ाया। उन्होंने भगवान को कहीं बाहर नहीं अपने भीतर ही ढूंढ़ा। स्वयं को ही पग-पग पर परखा और निथारा। स्वयं को भक्त माना और उस परम ब्रह्म परमात्मा का दास कहा।

वह अपने और परमात्मा के मिलन को ही सब कुछ मानते। शास्त्र और किताबें उनके लिये निरर्थक और पाखण्ड था, सुनी-सुनाई तथा लिखी-लिखाई बातों को मानना या उन पर अमल करना उनको गंवारा नहीं। इसीलिये उन्होंने जो कहा अपने अनुभव के आधार पर कहा, देखा और भोगा हुआ ही उन्होंने व्यक्त किया, यही कारण है कि उनके दोहे इंसान को जीवन की नई प्रेरणा देते थे।
 कबीर ने जिस भाषा में लिखा, वह लोक प्रचलित तथा सरल थी। कबीर शब्दों का महासागर है, ज्ञान का सूरज है। उनके बारे में जितना भी कहो, थोड़ा है, उन पर लिखना या बोलना असंभव जैसा है। सच तो यह है कि बूंद-बूंद में सागर है और किरण-किरण में सूरज। उनके हर शब्द में गहराई है, सच का तेज और ताप है।

कबीर ने लोगों को एक नई राह दिखाई। घर-गृहस्थी में रहकर और गृहस्थ जीवन जीते हुए भी शील-सदाचार और पवित्रता का जीवन जिया जा सकता है तथा आध्यात्मिक ऊंचाइयों को प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि पूजा-पाठ और धार्मिक आडंबरों से आध्यात्मिक प्रगति नहीं होती है। आध्यात्मिक प्रगति होती है अपने मन को वश में रखने से, उसे निर्मल करने से और मन की पवित्रता से।

कबीर ‘मसि-कागद’ छुए बगैर ही वह सब कह गए। समाज की दुखती रग को पहचान लिया था। वे जान गए थे कि हमारे सारे धर्म और मूल्य पुराने हो गए हैं। नई समस्याएँ नए समाधान चाहती हैं। नए प्रश्न, नए उत्तर चाहते हैं। नए उत्तर, पुरानेपन से छुटकारा पाकर ही मिलेंगे।
 कबीर ने जो कहा वह ताल ठोक कर दृढ़ता के साथ कहा……

फूटी आँख विवेक की, लखे ना सन्त असन्त ।
जाके संग दस-बीस हैं, ताको नाम महन्त ॥

समझाये समझे नहीं, पर के साथ बिकाय ।
मैं खींचत हूँ आपके, तू चला जमपुर जाए ॥

फ़कीर क्या होता है इसे बताते हुए कबीर कहते हैं……

उदर समाता अन्न लै, तनहिं समाता चीर।
अधिकहि संग्रह ना करै, ताको नाम फकीर।।

मान्यता है कि काशी में मरने से सीधा स्वर्ग की प्राप्ति होती है, इसलिए अंत समय लोग काशी में आकर मरना चाहते थे । कबीर दास ने पन्द्रहवीं शताब्दी में लोगों के दिमाग से इस मिथक को तोड़ने के लिये कि जिसकी भी मृत्यु मगहर में होगी वो अगले जन्म में बंदर बनेगा और साथ ही उसे स्वर्ग में जगह नहीं मिलेगी।
 देहावसान हेतु काशी के बजाय मगहर, जो लखनउ शहर से 240 किमी दूरी पर स्थित है, को चुना। 1575 विक्रम संवत में हिन्दू कैलेंडर के अनुसार माघ शुक्ल एकादशी के वर्ष 1518 में जनवरी के महीने में 2 तारीख को मगहर में उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा । एक मिथक को मिटाने के लिये कबीरदास की मृत्यु काशी के बाहर हुई।

 आलेख ,,

राजू दास मानिकपुरी, कवर्धा

 

 

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