कबीर क्रांति ब्रेकिंग न्यूज़ **देखिये, श्रीपाल शर्मा की रिपोर्ट

गुलामी के दिनों कांग्रेस महारानी के प्रति वफादार रही आजादी के बाद राजमाता व युवराज के प्रति
गुलामी के दिनों कांग्रेस महारानी के प्रति वफादार रही

आजादी के बाद राजमाता व युवराज के प्रति

श्रीपाल शर्मा प्रत्रकार

कैसी विडम्बना है जिस दल के लोग देश को आजादी दिलाने का दावा कर रहे हैं, उस पार्टी की स्थापना 1885 में महारानी विक्टोरिया के वफादार अवकाश प्राप्त एक अंग्रेज अफसर ह्यूम द्वारा की गई, स्थापना के समय की कांग्रेस का उद्देश्य था ऐसे लोगों को इसमें शामिल किया जाय जो अपने देश के प्रति नहीं बल्कि महारानी के प्रति निष्ठा व भक्ति रखे इस संस्था में केवल अंग्रेजी लिखने व बोलने वाले सम्मलित हो सकते थे हिन्दू साधु सन्त महात्मा व ऐसे लोग जिनकी शिक्षा-दीक्षा सरकारी स्कूल कालेजों में नहीं हुई हो उन्हें कांग्रेस में नहीं लिया जाता था।

स्थापना के समय कांग्रेस का उद्देश्य था अंग्रेज महारानी के प्रति वफादार व अंग्रेजी बोलने वाले भारतीय पैदा करना। एक जानकारी के अनुसार एक अधिवेशन में कांग्रेस के संस्थापक ह्यूम में डेलीगेटों के सम्मुख प्रस्ताव पेश रखा की

“हम ब्रिटिश साम्राज्य की मल्लिका को जिसे हम सब प्रिय है। जिसके हम सब बेटे है जिसकी मैं जूतियां भी सीधी करने लायक नहीं हूं”

तालियां बजाकर धन्यवाद दें।

एक सरकारी रिकार्ड के अनुसार ह्यूम के इस प्रस्ताव से सम्मेलन में इतनी तालियां बजी की ह्यूम का बाकी का भाषण तालियों की आवाज के कारण सुनाई नहीं पड़ा।

कांग्रेस की स्थापना के दस वर्ष पश्चात जब लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, विपिन चंद्र पाल, सुभाषचंद्र बोस, देशबन्धु चितरंजन दास जैसे प्रखर देश भक्त लोग कांग्रेस में आये तो देश को पूर्ण आजादी दिलाने की बात ने जोर पकड़ी।

ये देशभक्त कांग्रेस के बड़े नेताओं को रास नहीं आ रहे थे।

नेहरू-गांधी आदि कांग्रेसी नेता पूर्ण आजादी की बात करने वाले लोगों का विरोध किया। कुछ मामले में वल्लभ भाई पटेल से गांधी-नेहरू का विरोध था पर पटेल कभी भी सामने नहीं आये।

विचारों में विरोध के कारण कांग्रेस में रस्सा कशी होती रही। कई अधिवेशनों में मार पीट व कुर्सी तोड़ फोड़ तक का मौका आ जाता था।

अन्ततः कांग्रेस का दो फाड़ हो गया। एक गुट नरम दल अथवा राजभक्त दल कहलाया उन्हें माडरेट भी कहा जाता था। दूसरा दल गरमदल देश भक्त व अंग्रेज़ लोग उग्रदल भी कहते थे।

पहले नरम दल के शीर्ष नेता थे गोविंद रानाडे, फ़िरोस शाह मेहता, महात्मा गांधी के गुरु गोपालकृष्ण गोखले आदि। दुसरे गरम दल के नेता थे बाल, पाल, लाल, सुभाष चंद्र बोस, सी आर दास आदि।

नरम दल वाले महारानी विक्टोरिया के प्रति वफादार थे तो गरम दल वाले देश व जनता के प्रति वफादार थे।

गांधीजी ने हमेशा नरम दल वालों का पक्ष लिया, गरमदल वाले उन्हें फूटी आंख भी पसंद नहीं था। गरमदल वाले नरम दल वालों की आँख में खटकते रहते थे।

सुभाष चंद्र बोस का नेहरू गांधी ने हमेशा विरोध किया। जब सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस अध्यक्ष के लिए त्रिपुरा मे खड़े हुए तो गांधी जी ने यथा शक्ति सुभाष चंद्रबोस का विरोध किया और अपने प्रत्याशी पट्‌टाभिसीतारमैया को खड़ा किया।

गांधी जी का प्रत्याशी हार गया तो गांधीजी भैखला गये और उन्होंने यहां तक कहां कि पट्‌टाभिसीतारमैया की हार मेरी व्यक्तिगत हार है, और नेताजी को अध्यक्ष पद से हटाने के लिए पूरी ताकत लगा दी।

नारम दल वाली कांग्रेस कभी नहीं चाहती थी कि अंग्रेज भारत से जाये और हमें पूर्ण आजादी प्राप्त हो। उन‌का कहना था कि अग्रेज भले लोग है वे भारत में सदा राज्य करे बस हमें थोड़ा बहुत सुख-सुविधा देते रहें।

देश के क्रान्तिकारी युवक जो आजादी के लिए अपनी जान की बाजी लगाते रहे नरम दल वाले कोंग्रेसियों को ये युवक पसंद नहीं थे। कॉग्रेसि व उनके नेता क्रांतिकारी युवकों को चोर लुटेरे डकैत व हत्यारे कहां करते थे।

जब देश के युवक आजादी के लिये फांसी पर चढ़ रहे थे, कालापानी का सजा भुगत रहे थे तब नेहरू खानदान के सदस्य अंग्रेज अफसरों के साथ मौज मस्ती कर रहे थे।

गुलामी के समय भी घर हो या जेल अंग्रेज उनकी सुख-सुविधा के ध्यान रखते थे। जेल जाना तो मात्र एक बहाना था।

जब आज़ाद हिन्द के फौजी जवान पकड़े गए तो उन्हें लालकिले में फांसी की सजा दी गई इससे भारतीय फौज जनता में बगावत फैल गई जगह जगह उपद्रव होने लगे।

अंग्रेजों को समझ में आ गया कि अब हमें हिन्दुस्तान में रहना मुश्किल हो जायेगा तो आनन फानन में अपने दत्तक पुत्र नारम दल वाले नेहरू गांधी को सत्ता सौंप दी।

कांग्रेस ने सत्ता के लालच में देश का विभाजन भी स्वीकार कर लिया।

तथाकथित आजादी के बाद भी कांग्रेस क्राऊन (महारानी) के प्रति वफादार रही।

इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तो एक नई राजमाता का उदय हुआ, तब से कांग्रेसी आज तक नई राजमाता व युवराज के प्रति वफादार है।

आज भले ही कांग्रेस सत्ता में नहीं है पर पूरी कांग्रेस राजमाता व युवराज का चरण वंदना किया करती है।

जो सच्चे कांग्रेसी हैं जो देश के प्रति वफादार है वे अपने सीने में पत्थर रख कर खामोश बैठे हैं।

कांग्रेस में आज राजमाता व युवराज के प्रति आस्था वा भक्ति रखे बिना कोई कांग्रेसी दल में एक मिनट भी नहीं रह सकता।

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