कवर्धा

गांधीवादी अहिंसा क्रान्तिकारी सावरकर जी की दृष्टि में December 18, 2025 गांधीवादी अहिंसा क्रान्तिकारी सावरकर जी की दृष्टि में श्रीपाल शर्मा की कलम से कबीर क्रांति ब्रेकिंग न्यूज़

गांधीवादी अहिंसा क्रान्तिकारी सावरकर जी की दृष्टि में
December 18, 2025
गांधीवादी अहिंसा क्रान्तिकारी सावरकर जी की दृष्टि में
श्रीपाल शर्मा की कलम से
कबीर क्रांति ब्रेकिंग न्यूज़
महानक्रान्तिकारी वीर दामोदर सावरकर गांधीजी की अहिंसा सिद्वान्त के प्रबल विरोधी थे, वे गांधीवादी अहिंसा को अव्यवहारिक ही नहीं हानिकारक भी मानते थे, उनकी दृष्टि में गांधीवादी अहिंसा शास्त्र-सम्मत नहीं है, उन्होंने गांधीवादी अहिंसा को आत्यन्तिक अहिंसा का नाम दिया है.
उनका मानना था कि इस प्रकार की अहिंसा मानव जीवन के लिए घातक है, एक उदाहरण के द्वारा उन्होंने गांधीवादी अहिंसा की निरर्थकता पर जोर दिया है. मान ले किसी स्थान पर छोटे-छोटे बच्चे सोयें है; वहां कोई पागल कुत्ता या जहरीला सर्प घुस आये, और किसी को काट खायें, हम गांधीवादी आत्यन्तिक अहिंसा के चक्कर में फंस कर उस सर्प व पागल कुत्ते को नहीं मारते हैं, तो आप पाप के भागीदार होते हैं

महत्वपूर्ण यह नहीं है कि पागल कुत्ता व सर्प हमारी कृत्य से बचता है कि नहीं; यदि जरूरी है तो उस सर्प व कुत्ता को मार डालना ही शास्त्र-सम्मत है. जरूरी है छोटे बच्चों को बचाना, सर्प या कुत्ता बचता है कि नहीं यह हमारे सोचने का विषय नहीं है.

सावरकर जी की दृष्टि में सीमित अहिंसा गुण है, आत्यन्तिक अहिंसा पाप है. अति हमेशा वर्जित है. गांधीवादी अहिंसा अति की सीमा को लांघता है. इस कारण वह त्याज्य है.

सावरकर जी का यह भी कहना था कि जैन-बौद्ध की अहिंसा गांधीजी की अहिंसा से भिन्न है. जैनधर्म व बौद्ध-धर्म में बताई गई अहिंसा-धर्म गांधीजी की अहिंसावाद से एक दम अलग है. गांधीजी की अहिंसा ने सभी प्रकार की परिस्थितियों में सशस्त्र प्रतिकार का विरोध किया है.

सावरकर जी का कहना है कि जिन जैन लोगों ने राज्य स्थापित किये वीर व वीरांगनाओं को पैदा किया उन्होंने समर भूमि में शस्त्रों से युद्ध किया अन्यायकारी आक्रमण का सशस्त्र विरोध करना केवल न्याय ही नहीं आवश्यक भी है आततायी को यदि आवश्यक हो तो उसे मार डालना ही उचित है.

बुद्ध ने कहा था कि यदि सत्कार्य के लिए शस्त्र लेकर लड़ते हैं तो कोई पाप नहीं लगता.
सावरकर जी का कहना था कि मानव का संरक्षक खड्ग् है, प्रकृति में कहीं भी गांधीवादी आत्यन्तिक अहिंसा का कोई स्थान नहीं है. प्रकृति में मानव के चारों तरफ क्रूर पशु व रेंगने वाले जीव-जन्तु हैं जिनके बड़े दांत, नाखून व विषैले दन्त हैं

मनुष्य ही एक मात्र सबसे कमजोर प्राणी है उस समय उसने अपनी रक्षा के लिए हथियार तैयार किया. हथियार… के बल से वह अपने से कई गुना ताकतवर व विशैले जानवर पर अधिकार कर सकता है.

गांधीवादी अहिंसा जो हमें किसी भी प्रकार के आक्रमण का विरोध नहीं करने की शिक्षा देता हैं वह मात्र मिथ्यावाद है. यह कोई साधु व महात्मा का लक्षण नहीं है. सशस्त्र प्रतिकार न करना इस प्रकार की बात करने वाला दर्शन अनीतिकारी व आत्मघाती है.

प्रकृति के नियम ही शाश्वत नियम है. किसी भी प्रकार की जीव हत्या नहीं करेंगे, पूर्णतः अहिंसावादी बने रहेंगे, शस्त्र नहीं उठायेंगे तो हमे हिंसक पशु चीर-फाड़ कर खा जायेगे.

सावरकर जी के अनुसार सीमित अहिंसा हमारा ध्येय होना चाहिए. हम मानव संरक्षण हेतु तलवार की उपासना करते हैं, हिन्दू लोग शक्ति देवता कालीमाता के प्रतीक के रूप में शस्त्रों की पूजा करते हैं.

स्मरण रहे कि गांधीजी ने कायरता व हिंसा में एक को चुनने पर हिंसा को चुनने की बात कही पर उन्होंने जिंदगी में कभी भी इस पर अमल नहीं किया न ही अपने शिष्यों को अमल करने दिया.

श्रीपाल शर्मा की कलम से
देखिये डी एन योगी की रिपोर्ट
कबीर क्रांति ब्रेकिंग न्यूज़

Spread the love

Related Articles

Back to top button