कबीर क्रांति ब्रेकिंग न्यूज़

देखिये डी एन योगी की रिपोर्ट*

सूखते सपने: बिना पानी के कुओं पर बहाया लाखों ,आदिवासी क्षेत्र में सरकारी राशि का खुला दुरुपयोग”**

आदिवासी क्षेत्रों में लक्ष्य पूर्ति के नाम पर योजनाओं की बर्बादी**

मस्टरोल जारी, काम बंद

कवर्धा ,, कबीर क्रांति

 कवर्धा**जनपद पंचायत बोड़ला के अंतर्गत ग्राम पंचायत सरेखा के आश्रित ग्राम मन्ना बेदी में आदिवासी कृषक रामकुवर उर्फ भगेला के खेत में निजी सिंचाई कूप निर्माण कार्य में गंभीर अनियमितताओं का मामला सामने आया है। शासन की योजनाओं के अंतर्गत स्वीकृत इस कुएं का निर्माण कार्य लगभग पूर्ण हो चुका है, लेकिन इसमें एक बूंद भी पानी नहीं है — और यह पहली बार नहीं है।

सूत्रों के अनुसार, इस क्षेत्र में पिछले तीन से चार वर्षों के भीतर करीब दस कुओं का निर्माण कार्य कराया गया, किंतु एक भी कुआं पानी देने में सक्षम नहीं है। इससे स्पष्ट है कि स्थल चयन में गंभीर लापरवाही बरती गई है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या इन कुओं का उद्देश्य केवल “फाइलों में काम पूरा करना” है?

मस्टरोल जारी, काम बंद 

 रामकुवर के खेत में बनाए जा रहे सिंचाई कूप के लिए दो मस्टरोल जारी किए गए — पहला 19 अप्रैल 2025 से 26 अप्रैल 2025 तक और दूसरा 28 अप्रैल से 4 मई 2025 तक। इनमें कुल 5 मजदूरों की उपस्थिति दर्शाई गई है, जबकि मौके पर देखा गया कि कार्य एक सप्ताह से बंद है। इतना ही नहीं, कुएं की खुदाई जेसीबी मशीन से कराई गई, जबकि मजदूरों का नाम मस्टरोल में चढ़ा कर भुगतान किया जा रहा है। वर्तमान में भी मस्टरोल जारी कर फर्जी हाजरी भरा जा रहा है।

नागरिक सूचना पटल भी नदारद

नियमों के अनुसार, हर निर्माण कार्य स्थल पर सूचना पटल प्रदर्शित करना अनिवार्य होता है, जिसमें स्वीकृति विवरण, लागत, संबंधित एजेंसी, समय सीमा आदि अंकित हो। परंतु इस कार्य स्थल पर ऐसी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। इससे पारदर्शिता की पूरी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न खड़े हो जाते हैं।

आदिवासी क्षेत्रों में लक्ष्य पूर्ति के नाम पर योजनाओं की बर्बादी

बोड़ला क्षेत्र आदिवासी बहुल होने के कारण यहाँ शासन द्वारा विशेष प्राथमिकता दी जाती है। अधिक संख्या में कुएं स्वीकृत किए जाते हैं ताकि किसान सिंचाई के लिए आत्मनिर्भर हो सकें। लेकिन जिन कुओं में पानी ही नहीं निकलता, वे किसानों के किसी काम के नहीं। यह न केवल सरकारी राशि की बर्बादी है, बल्कि किसानों के साथ एक क्रूर मज़ाक भी है।

जिम्मेदार कौन 

इस पूरे मामले से कई सवाल उभरते हैं

बिना जलस्रोत के क्षेत्र में कुएं स्वीकृत कैसे हो गए , स्थल चयन की जिम्मेदारी किसकी थी , मजदूरों की जगह मशीनों से खुदाई कर मस्टरोल में फर्जी हाजिरी क्यों , निगरानी तंत्र की भूमिका क्या रही ।

सरकार की मंशा भले ही ग्रामीण और आदिवासी किसानों की मदद करना हो, लेकिन जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार और लापरवाही योजनाओं की आत्मा को ही मार रही है। ज़रूरत है कठोर जांच, जवाबदेही तय करने और भविष्य में पारदर्शी क्रियान्वयन की।

Spread the love

You missed