
“चिंता ढलती उम्र की”लेखक संत थवाईत कवर्धा
अक्सर होटलों ठेले खोमचे के आसपास कुछ ऐसे बुजुर्गों को भीख मांगते देखता हूँ जिनके चेहरे पर गरीबी और अभावग्रस्त होने का भाव मुझे दिखता नहीं ऐसे लोगो के चेहरे पे तेज, बेफिक्री और भीख न देने पर सहनशीलता का भाव दिख जाता हैं
चूंकि जिंदगी के 25 सालों से भी अधिक एनजीओ में बिताया गया इसलिए एक सामाजिक कार्यकर्ता होने के नाते ऐसे बुजुर्गों से संवाद भी करते रहता हूँ कि आखिर वो भीख क्यों मांग रहा
आज सुबह ही एक होटल के पास ऐसा ही एक बुजुर्ग आया शरीर से हट्टा कट्टा ,मस्त सफेदी वाला कुर्ता धोती पहने वह बुजुर्ग कुछ पैसा मांगने लगा ,मैंने उसके परिवार की पृष्ठभूमि के बारे में बात की ,उसने बताया तीन बेटे हैं एक रायपुर एक तखतपुर में काम करता है और एक स्थानीय यही है फिर पूछा खेती किसानी घर आदि है ?
उसने बताया सब है ,तो फिर भी क्यों मागंते हो ! यह पूछने पर उसने कहा घर मे समय नही कटता
इसी तरह की एक कहानी और है जो सिर्फ समय काटने के इरादे से कुछ घण्टे घर घर भीख मांग कर अपना समय काटता है मेरी चर्चा बहुतों से होती है मगर उदाहरण मात्र ये दो बता रहा हूँ
इंसान के पास सब कुछ होते हुए भी वह ऐसा कार्य समय काटने के लिए ही क्यों करता है इसके पीछे जाने पर मुझे लगता है कि –
इंसान अपने जवानी भर केवल परिवार के लिए ही जीया है इसलिए कठिन दौर आने पर उसके साथ परिवार से इतर कोई मित्र नही
केवल स्व के लिए जीने के कारण कोई संस्था समिति या धर्मार्थ कार्यो से जुड़ाव न रखना जिसके कारण ढलती उम्र में अकेला पन महसूस करना
परिवारजन अपने आप मे खोये रहने और आधुनिक तकनीक से वंचित बुजुर्ग के बीच शायद तकनीक ने भी दूरी बढ़ाने का काम किया
पठन पाठन ,धर्म कर्म से पूरी जवानी दूर रहने के कारण उम्र के ढलान पर अकेले रह जाना
कला संगीत कारीगरी के प्रति रुचि न होना भी बहुतों को अपना समय भारी लगता है
देश मे अभी 60 साल से ऊपर लगभग 15 करोड़ बुजुर्ग है जो आगामी 25 सालो में दुगुना हो जाएगा ,फिर भी हमारी सरकारों में शामिल बुजुर्ग नेतृत्व को ही बुजुर्गों की कोई चिंता नही दिखती ,ऐसे बुजुर्गों को समय बिताते हुए अंत समय मे भी सम्मान जनक जीवन मिल सके इसके लिए समाज और सरकार दोनों को सोचना पड़ेगा
लेखक
संत थवाईत
कवर्धा



