खिलाफत का समर्थन गांधी की बड़ी भूल हजारों हिन्दुओं की निर्ममता पूर्वक हत्या श्रीपाल शर्मा प्रत्रकार की कलम से “बहुत पहले मैंने नगर के एक दैनिक समाचार-पत्र के दीपावली विशेषांक में एक महाशय का लेख पढ़ा था। लेख का शीर्षक था “एक और खिलाफत आंदोलन की आवश्यकता”। लेख पढ़ने से पता चला कि लेखक महोदय खिलाफत आंदोलन को भी असहयोग आंदोलन की तरह एक आंदोलन समझ रहे हैं। जबकि सत्य यह है कि खिलाफत का हमारे देश से कोई संबंध नहीं था। यह विशुद्ध रूप से एक विदेशी आंदोलन था, जिसका प्रारंभ तुर्की मे खलीफा के खिलाफ वहाँ के एक क्रांतिकारी युवा नेता कमालपाशा ने शुरू किया था। तुर्की के खलीफा भ्रष्ट व चरित्रहीन हो रहे थे और अपने पद का दुरुपयोग कर जनता को लूटने का काम कर रहे थे। उस समय खलीफा को अल्लाह का प्रतिनिधि और समस्त इस्लामी जगत का पंथ-गुरु समझा जाता था। कमालपाशा ने तुर्की के खलीफा की निंदा की और उसके खिलाफ आंदोलन जनता की मदद से छेड़ दिया। भारत के मुसलमान खलीफा के समर्थक थे। मुस्लिम नेताओं ने कांग्रेस से मदद माँगी। कांग्रेस के नेताओं ने मदद का आश्वासन दिया और बिना सोचे-समझे आंदोलन में कूद पड़े। गाँधीजी भी मदद करने वाले प्रमुख नेता थे। “गांधीजी भारतीय मुसलमानों को खुश कर अपनी तरफ करना चाहते थे। कांग्रेस के प्रायः सभी बड़े नेता गांधीजी के प्रभाव में थे, (और) हिंदुओं को भी मदद का आह्वान किया। कांग्रेस में कुछ नेता ऐसे भी थे जो नहीं चाहते थे कि कांग्रेस एक विदेशी आंदोलन में कूदे। उन्होंने कांग्रेस को सचेत किया कि खिलाफत जैसे सांप्रदायिक उन्माद में कूदने से बहुत बड़ा नुकसान हो सकता है। पर गांधीजी के हठ के आगे किसी की न चली। खिलाफत आंदोलन में कूदने के लिए गांधीजी इतने आतुर थे कि उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि खिलाफत के प्रश्न पर सफलता प्राप्त करने के लिए यदी आवश्यक पड़ी तो स्वराज के प्रश्न को स्थगित कर दूँगा। कांग्रेस व गांधीजी को ऐसा लग रहा था कि हम इस तरह भारतीय मुसलमानों को अपने पक्ष में कर सकते हैं। हिंदुओं का सहयोग प्राप्त होते देखकर मुसलमानों में अत्यधिक उत्साह जाग्रत हो गया। भारत में खिलाफत आंदोलन जोर पकड़ रहा था, उधर तुर्की में कमालपाशा के नेतृत्व में खिलाफा के विरुद्ध आंदोलन की आग दिन-प्रतिदिन भड़कती जा रही थी। “तुर्की का सुल्तान अंग्रेजों के हाथों में खेल रहा था। देशवासियों को अपने विरुद्ध देखकर एक दिन सुल्तान ने भाग खड़ा हुआ । तुर्की में एक राष्ट्रवादी राज्य का उदय हो रहा था जो अंग्रेजों को पसंद नहीं था। अंग्रेजों ने खलिफा को कमालपाशा के विरुद्ध कर दिया। कमाल पाशा को यह भी लालच दिया गया कि वे खलीफा बन जाएँ। उन्होंने मुसलमानों का कोई प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया, बल्कि खलीफाई को ही समाप्त कर दिया। भारत के कई मुस्लिम नेता जो कमाल पाशा को समझाने गए थे, उन्होंने उन्हें बुरी तरह लताड़ कर भगा दिया। (भारत के मुसलमान उसके अपमान के बाद भी चुप नहीं बैठे।) उन्होंने अरब और ईरान के नेताओं से बात की, पर उन्होंने भी उन्हें दुत्कार दिया। भारत के मुसलमान खिलाफत के पक्ष में बहुत प्रयास करते रहे। तुर्की में खिलाफत समाप्त हो चुका था। भारत के मुसलमान मे अंदर ही अंदर खिलाफत के पक्ष में आग भड़क रही थी। खिलाफत आंदोलन का तत्कालीन प्रभाव यह पड़ा कि उससे कई दुखदाई प्रभाव सामने आये। कुंठित मुसलमानों ने अपना आक्रोश शांत बैठे हिन्दुओ निकाला। हज़ारों हिंदू मारे गये अनेक हिंदू ज़बरन मुसलमान बनाये गये। करोड़ो की संपत्ति लूट ली गयी हज़ारों हिंदू महिलाओं का शील-हरण हुआ। मालाबार में हिंदुओं पर घोर अत्याचार हुआ। मुस्लिम दंगाइयों ने राह चलती गर्भवती महिलाओं को भी नहीं छोड़ा। तेज़ हथियार से उनके पेट फाड़ दिये गये। अजन्मे बच्चों का खून से लथपथ लोठड़ा सडक मे फैल गया अत्याचार का वो नंगा नाच हुआ कि हिंदुओं की आत्मा काप गयी। मोपला विद्रोहियों ने ख़ूब रक्तपात किया। नेहरू गांधी हाथ पर हाथ धरे रहे गये कुछ नहीं कर पाये। खिलाफत आंदोलन का दूरगामी दुखत दुष्परिणाम यह हुआ कि मुसलमानों में मुस्लिम धर्मांधता बढ़ गई। गांधीजी का मुसलमानों को अपने पक्ष में करने का हठ का दुष्परिणाम अंततः मासूम हिंदुओं को भुगतना पड़ा। कबीर क्रांति ब्रेकिंग न्यूज़ Spread the love Post navigation कबीर क्रांति ब्रेकिंग न्यूज़ | डी एन योगी की रिपोर्ट पंडरिया का रुखमिदादर बेहाल — भीषण गर्मी में पानी-बिजली के लिए तरसते ग्रामीण *विशेष लेख* *छत्तीसगढ़ की जड़ी-बूटियों से महकेगा नारी शक्ति का स्वावलंबन* *औषधि पादप बोर्ड की नई कार्ययोजना से आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिख रही हैं ग्रामीण महिलाएं* धनंजय राठौर संयुक्त संचालक अशोक कुमार चंद्रवंशी सहायक जनसंपर्क अधिकारी