कबीर क्रांति ब्रेकिंग न्यूज़ | डी एन योगी की रिपोर्ट
पंडरिया का रुखमिदादर बेहाल — भीषण गर्मी में पानी-बिजली के लिए तरसते ग्रामीण
कवर्धा जिले के पंडरिया विकासखंड का अंतिम गांव रुखमिदादर आज भी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में जिंदगी से जंग लड़ रहा है। बैगा जनजातीय बहुल इस गांव में भीषण गर्मी ने हालात को और भयावह बना दिया है। एक तरफ आसमान से बरसती आग, दूसरी तरफ सूखे नल और अनियमित बिजली—यहां की जिंदगी संघर्ष का दूसरा नाम बन चुकी है।
पानी के लिए जंग
गांव में पेयजल संकट अब विकराल रूप ले चुका है।
हैंडपंप जवाब दे चुके हैं, जलस्तर लगातार गिर रहा है, और नल-जल योजनाएं सिर्फ कागजों में सिमटकर रह गई हैं।
महिलाएं और बच्चे रोज सुबह मटके लेकर कई किलोमीटर दूर पानी की तलाश में निकलते हैं
तपती धूप में घंटों पैदल चलना यहां की मजबूरी बन चुकी है
शिकायतों के बावजूद अब तक कोई ठोस समाधान नहीं
ग्रामीणों का दर्द साफ है—“पानी के लिए रोज लड़ाई लड़नी पड़ रही है, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं।”
बिजली बनी मजाक
रुखमिदादर में बिजली की स्थिति भी बदहाल है।
शाम 7 से रात 10 बजे तक ही कभी-कभार बिजली
दिनभर अंधेरा और उमस
बच्चों की पढ़ाई प्रभावित, छोटे व्यवसाय ठप
सौर ऊर्जा योजना भी फेल:
गांव में लगे सोलर पैनल खराब पड़े हैं, रखरखाव का कोई सिस्टम नहीं। जो उम्मीद थी, वह भी अब टूटती नजर आ रही है।
विकास से दूर एक पूरा गांव
सरकारी योजनाओं के दावों के बीच रुखमिदादर की हकीकत कई सवाल खड़े करती है—
सड़क, स्वास्थ्य और संचार सुविधाएं सीमित
बैगा जनजाति आज भी मूलभूत अधिकारों से वंचित
योजनाएं कागजों तक सीमित, जमीनी असर नदारद
जब शहरों में एसी और पानी की मांग बढ़ती है, तब यहां लोग दो वक्त के पानी और कुछ घंटों की रोशनी के लिए जूझ रहे हैं।
जिम्मेदार कौन?
सबसे बड़ा सवाल यही है—
आखिर आजादी के दशकों बाद भी रुखमिदादर जैसे गांव बुनियादी सुविधाओं से क्यों वंचित हैं?
क्या योजनाएं सिर्फ फाइलों में ही जिंदा रहेंगी, या कभी जमीन पर भी उतरेंगी?
अब फैसला प्रशासन को करना है
भीषण गर्मी में तड़पते रुखमिदादर की यह पुकार अब व्यवस्था के दरवाजे पर जोरदार दस्तक दे रही है।
देखना होगा—क्या जिम्मेदार जागेंगे या यह गांव यूं ही अंधेरे और प्यास में जिंदगी काटता रहेगा।
कबीर क्रांति — सच के साथ, जनता की आवाज

Spread the love

You missed