कवर्धा

  कवर्धा,,    कबीर क्रांति ब्रेकिंग न्यूज़ राष्ट्रोत्कर्ष दिवस पर विशेष :-अवधेशानन्दन श्रीवास्तव ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय श्रीगोवर्धनमठ पुरीपीठाधीश्वर अनन्तश्रीविभूषित जगद्गुरुशंकराचार्य स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वती जी महाभाग का 84 वां प्राकट्य दिवस  (आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी, तदानुसार 12 जुलाई 2026)

  कवर्धा,,    कबीर क्रांति ब्रेकिंग न्यूज़

राष्ट्रोत्कर्ष दिवस पर विशेष :-अवधेशानन्दन श्रीवास्तव

ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय श्रीगोवर्धनमठ पुरीपीठाधीश्वर अनन्तश्रीविभूषित जगद्गुरुशंकराचार्य स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वती जी महाभाग का 84 वां प्राकट्य दिवस 

(आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी, तदानुसार 12 जुलाई 2026)

 

      लेखक :- अवधेशनन्दन श्रीवास्तव

 

आज पूरी दुनिया “राष्ट्रोत्कर्ष दिवस” मनाती है आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी के दिन । जो शुभ दिवस है- सनातन धर्म के सार्वभौम धर्मगुरु श्रीमज्जगद्‌गुरु शंकराचार्य स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वती जी महाभाग के प्राकट्य का।

अपने अलौकिक तत्वज्ञान एवं दिव्य तथा अद्वितीय मेधा शक्ति के बल पर भारतवष को पुनः विश्वगुरु के रुप में उभारने वाले वेदादि शास्त्रों के परमज्ञाता, सनातन धर्म के सर्वोच्च, सर्वमान्य और सार्वभौम धर्मगुरु ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय श्रीगोवर्धनमठ पुरीपीठाधीश्वर अनन्तश्रीविभूषित जगद्‌गुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती जी महाभाग का दिव्य अवतरण बिहार प्रान्त के मिथिलांचल में दरभंगा जिले, जिसे वर्तमान में मधुबनी कहते हैं, के हरिपुरबख्शीटो नामक गांव में आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी, दिन बुधवार, रोहिणी नक्षत्र, विक्रम सम्वत् 2000 अर्थात् 30 जून ईसवी सन् 1943 को हुआ था। जिनका श्रीगोवर्धनमठ पुरी पीठ के 144वें श्रीमज्जगद्‌गुरु शंकराचार्य स्वनामधन्य श्रीनिरंजनदेव तीर्थ जी महाभाग के चिन्मय कर कमलों से माघ शुक्ल षष्ठी, रविवार विक्रम सम्वत् 2048 तदानुसार 09 फरवरी सन् 1992 को श्रीगोवर्धनमठ के 145 वें श्रीमज्जगद्‌गुरु शंकराचार्य के पद पर अभिषेक हुआ था। आज भारत सहित समूचे विश्व में रहने वाले श्रद्वालुजन पूज्यपाद के प्राकट्य दिवस को “राष्ट्रोत्कर्ष दिवस” के रुप में अत्यन्त हर्षोल्लासपूर्वक मनाते हैं।

शंकराचार्य जी ने अन्यों के हितों का ध्यान रखते हुए हिन्दुओं के अस्तित्व और आदर्श की रक्षा तथा देश की सुरक्षा और अखण्डता की भावना से चैत्र शुक्ल नवमी वर्ष 1992 को पीठपरिषद और उसके अन्तर्गत् पुरुषों के लिए आदित्यवाहिनी तथा देवियों के लिए आनन्दवाहिनी नामक दिव्य संस्थाओं की स्थापना की। जिनके माध्यम से सनातन मानबिन्दुओं की रक्षा के विविध अभियान यथा- श्रीरामसेतु रक्षा अभियान, श्रीगंगारक्षा अभियान, श्रीरामजन्मभूमि अभियानादि पूज्यपाद के मार्गदर्शन में संचालित हुए । इन संस्थाओं का उद्देश्य व्यक्ति तथा समाज को सुबुद्ध, सत्यसहिष्णु और स्वावलम्बी बनाना भी है। यह उनका अभियान है कि प्रत्येक व्यक्ति प्रतिदिन 1 रुपया और 1 घण्टा समष्टि हित की भावना से निकाले तथा उसे अपने क्षेत्र को सुसंस्कृत बनाने में लगाये।

सनातन मानबिन्दुओं की रक्षा तथा राष्ट्र की सुरक्षा और अखण्डता के लिए उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया है। उत्तराखण्ड में वसुधारा से लेकर तीन चौथाई भारत की पदयात्रा करने वाले श्रीमज्जगद्‌गुरु शंकराचार्य जी उस समय देश की सीमाओं पर भी गए जब सीमाओं में परिस्थितियां प्रतिकूल बन रहीं थीं, वहां जवानों के बलाबल और सेना की तैयारी की जानकारी ली। फिर वहां से लौटकर उन्होंने तत्कालिन प्रधानमन्त्री जी को कारगिल युद्ध की सम्भावनाओं से अवगत कराते हुए उन्हें सचेत कर अपने राष्ट्रधर्म का परिचय दिया था। राष्ट्र की रक्षा, सत्य की रक्षा और धर्म की रक्षा को सर्वोच्च मानने वाले पूज्यपाद को अपनी सिद्धान्तनिष्ठा के कारण प्रारम्भ से ही कठित यातनाएं सहनी पड़ रही हैं, लेकिन वे गुरु, ग्रन्थ और गोविन्द में अटूट आस्था के बल पर अपने सिद्धान्त से समझौता किए बिना निरन्तर आगे बढ़ रहे हैं। उन्हें तो गौरक्षा के लिए तिहाड़ जेल भी जाना पड़ा जब 7 नवम्बर सन् 1966 को नई दिल्ली में आयोजित गौरक्षा के विशाल आन्दोलन में सन्त महात्माओं तथा गौभक्तों के साथ उन्होंने भी भाग लिया था जिस पर उन्हें धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाभाग के साथ 09 नवम्बर 1966 को बन्दी बनाकर 52 दिनों तक तिहाड़ जेल में रखा गया था।

श्रीमज्जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानन्द सरस्वतीजी महाभाग सनातन धर्म के सर्वोच्च धर्मगुरु एवं सर्वोच्च न्यायाधिपति हैं। उन्होंने विश्वप्रसिद्ध श्री जगन्नाथ मन्दिर श्री मन्दिर के वर्षों पुराने विवाद पर जो शास्त्रसम्मत निर्णय दिया उसे यथारुप मान्य उच्च न्यायालय भुवनेश्वर ने स्वीकार किया। इलाहाबाद हाई कोर्ट सहित नईदिल्ली स्थित देश के सुप्रीम कोर्ट में संविधान के स्वरुप पर उन्होंने वरिठ न्यायाधीशों तथा अधिवक्ताओं के मध्य अपने वैदुष्यपूर्ण प्रवचन के माध्यम से जो प्रकाश डाला वह भीतर से झकझोरने वाला था। संविधान के स्वरुप को निरुपित करते हुए उन्होंने उच्चतम न्यायालय में कहा कि-” काल के द्वारा, देश के द्वारा, वस्तु या व्यक्ति के द्वारा जिसकी उपयोगिता तनिक भी कुंठित ना हो, हर देश में, हर काल में, हर व्यक्ति के लिए जिसकी उपयोगिता अक्षुण्ण रहे, ऐसा संविधान सर्वोत्कृष्ट माना जायेगा। रिक्षा, रक्षा, वाणिज्य, कृषि, गोरक्ष्य और सेवा का प्रकल्प सबको सदा सन्तुलित रुप से सुलभ होता रहे, यह उस संविधान का उत्कर्ष माना जायेगा।

पूज्यपाद ने विश्व को राजनीति की स्वस्थ परिभाषा देते हुए कहा कि “सुसंस्कृत, सुीिक्षित, सुरक्षित, सम्पन्न, सेवापरायण, स्वस्थ एवं सर्वहितप्रद व्यक्ति तथा समाज की संरचना विश्व स्तर र राजनीति की परिभाषाउ‌द्घोषितहो।” इस परिभाषा क हर शद में समष् िहित का भाव सन्निहित है। इसके क्रियान्वयन से विश्व का कल्याण सुनिश्चित है।

दो के प्रसिद्ध वैज्ञानिक संस्थान इसरो, डीआरडीओ, आईआईटी, आई सी एम आर, भाभा परमाणु अनुसन्धान केन्द्र सहित प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में वेद और विज्ञान विषय पर उन्होंने अपने प्रवचन के माध्यम से विज्ञान की ऐसी वेदादि शास्त्रसम्मत विवेचना की जिसे देख सम्पूर्ण वैज्ञानिक संस्थान एवं शिक्षाजगत चकित है और एक अबोध बालक की भांति पूज्यपाद के श्रीचरणों में बैठकर ज्ञान प्राप्त कर रहा है।

यहां यह विषेश रुप से उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्र महासंघ ने दिनांक 28 से 31 अगस्त 2000 को न्यूयार्क में आयोजित विश्व शांति शिखर सम्मेलन तथा वर्ल्ड फेथ्स डेवलपमेंट डाइलाग 2000 के वाशिंगटन सम्मेलन के अवसर पर उनसे लिखित मार्गदर्शन प्राप्त किया था। जिसे श्री गोवर्धनमठ से संबंधित स्वस्ति प्रकाशन संस्थान द्वारा कमशः “विश्वशांति का सनातन सिद्धान्त” तथा सुखमय जीवन का सनातन सिद्धान्त” शीर्षक से वर्ष 2000 में पुस्तक के रुप में प्रकारित किया गया था।

कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के कारण और उसके निदान के लिए उनके द्वारा दिया गया मार्गदर्शन अत्यन्त अद्भुत होने के साथ साथ अनुकरणीय है। जो श्रीगोवर्धमठ के यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध है।

पूज्यपाद ने धर्म-अध्यात्म, राष्ट्र एवं सनातन संस्कृति पर लगभग 200 दिव्य ग्रन्थों की रचना की है और उनकी लेखनी निरन्तर निर्बाध गति से जारी है। सिर्फ गणित विषय पर ही उन्होंने विलुप्त सूत्रों को अपनी अद्भुत प्रज्ञा शक्ति और मेधा शक्ति के बल पर पुनः उद्भाषित करते हुए 15 से अधिक दुर्लभ ग्रन्थों की रचना की है। उनका प्रत्येक ग्रन्थ न केवल सदियों से विलुप्त ज्ञान-विज्ञान को अत्यन्त उदारतापूर्वक उद्भाषित करता है अपितु विकृत ज्ञान-विज्ञान को शुद्ध एवं परिष्कृत कर विश्वसमुदाय को उज्जवल मार्ग दिखाता है।

यह गर्व का विषय है कि विश्वप्रसिद्ध कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, उत्तर कोरिया, दक्षिण कोरिया, नेपाल, भूटान सहित अनेक देश महाराजश्री के द्वारा रचित दुर्लभ ग्रन्थों का लाभ उठा रहे हैं। यदि देश को पुनः विश्वमंच पर गौरवशाली स्थान दिलाना है तथा राष्ट्र का सही मायने में धर्मनियन्त्रित, पक्षपातविहीन, शोषणविनिर्मुक्त, सर्वहितप्रद चतुर्दिक विकास करना है तो शासनतन्त्र का यह पुनीत दायित्व है कि वह श्रीचरणों में बैठकर राष्ट्र के उत्कर्ष के लिए मार्गदर्शन प्राप्त करे साथ ही महाराजश्री द्वारा रचित एवं सम्पूर्ण विश्व को दिश देने वाले ऐसे दुर्लभ ग्रन्थों का समष्टिहित की भावना से व्यापक प्रचार प्रसार करे तथा उन्हें विद्यालयीन और महाविद्यालयीन पाठ्यक्रमों में सम्मिलित कर उसके अध्ययन, अध्यापन एवं प्रशिक्षण की सर्वत्र एवं समुचित व्यवस्था करे। ताकि देश की मेधाशक्ति, रक्षाशक्ति, वाणिज्यशक्ति एवं श्रमशक्ति को दिशाहीन होने से बचाया जा सके एवं पूज्यपाद द्वारा प्रदत्त ज्ञान विज्ञान से सबकी मेधाशक्ति को समृद्ध एवं सशक्त बनाकर उसका राष्ट्रहित में उपयोग किया जा सके।

पूज्यपाद के प्राकट्य दिवस के अवसर पर भगवान श्री चन्द्रमौलीश्वर से प्रार्थना है कि अखिल विश्व के पथप्रदर्शक, सनातन धर्म के रक्षक तथा भगवान श्रीजगन्नाथ महाप्रभु की चलमूर्ति पूज्यपाद श्रीमज्जगद्‌गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री निश्चलानन्द सरस्वती जी महाभाग को वे स्वस्थ और सुदीर्घायु जीवन प्रदान करें ताकि उनके आध्यात्मिक मागदर्शन में व्यक्ति, समाज और राष्ट्र का सर्वविध उर्का को सके, विश्व का कल्याण हो सके।

लेखक अवधेशनन्दन श्रीवास्तव

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