पुलिस, राजनीति और पत्रकारिता अपने दायित्वों से भटक जाएं तो समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है?

**डी एन योगी, संपादक — कबीर क्रांति

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती तीन महत्वपूर्ण स्तंभों पर टिकी होती है —

पुलिस, राजनीति और पत्रकारिता।

इनका उद्देश्य जनता की सेवा, सुरक्षा और सच्चाई को बनाए रखना होता है। लेकिन जब यही तीनों अपने मूल दायित्वों से भटकने लगते हैं, तब समाज में अराजकता, भ्रष्टाचार और भय का माहौल पैदा होने लगता है।

जब राजनीति सेवा छोड़ सत्ता का खेल बन जाए

राजनीति का उद्देश्य जनता की समस्याओं का समाधान और विकास होना चाहिए।

लेकिन जब राजनीति में सेवा की जगह स्वार्थ, भ्रष्टाचार और सत्ता का अहंकार हावी हो जाता है, तब:

जनता का भरोसा टूटने लगता है

योजनाएं केवल कागजों में सीमित रह जाती हैं

दलाल और भ्रष्ट तंत्र मजबूत हो जाते हैं

गरीब और कमजोर वर्ग उपेक्षित हो जाता है

ऐसी स्थिति में लोकतंत्र केवल चुनाव तक सीमित रह जाता है।

जब पुलिस निष्पक्षता छोड़ दबाव में काम करे

पुलिस कानून की रक्षक होती है।

लेकिन यदि पुलिस राजनीतिक दबाव, पैसे या प्रभाव में काम करने लगे तो:

अपराधियों का मनोबल बढ़ जाता है

आम जनता न्याय के लिए भटकती है

निर्दोष परेशान होते हैं

कानून का डर खत्म होने लगता है

जब जनता को न्याय नहीं मिलता, तब समाज में असुरक्षा और गुस्सा बढ़ता है।

जब पत्रकारिता सच छोड़ समझौता करने लगे

पत्रकारिता लोकतंत्र की आंख और आवाज मानी जाती है।

पत्रकार का धर्म है सच दिखाना, चाहे वह किसी के खिलाफ ही क्यों न हो।

लेकिन जब पत्रकारिता:

सत्ता की चापलूसी करने लगे

विज्ञापन और दबाव में सच छिपाने लगे

जनता की आवाज दबाने लगे

तब समाज तक सच्चाई पहुंचनी बंद हो जाती है।

भ्रष्टाचार और अन्याय पर्दे के पीछे फलने-फूलने लगते हैं।

समाज पर सबसे बड़ा प्रभाव

यदि पुलिस, राजनीति और पत्रकारिता तीनों ही अपने दायित्व भूल जाएं, तो:

लोकतंत्र कमजोर हो जाता है

भ्रष्टाचार व्यवस्था बन जाता है

जनता का सिस्टम से विश्वास उठ जाता है

भय, अन्याय और अराजकता बढ़ने लगती है

फिर आम आदमी खुद को अकेला और असहाय महसूस करने लगता है।

निष्कर्ष

एक मजबूत समाज के लिए:

राजनीति में ईमानदारी

पुलिस में निष्पक्षता

पत्रकारिता में निर्भीकता

बहुत जरूरी है।

क्योंकि जब ये तीनों अपने धर्म पर टिके रहते हैं, तभी लोकतंत्र जीवित रहता है और जनता सुरक्षित महसूस करती है।

 डी एन योगी

संपादक — कबीर क्रांति

Spread the love

You missed